मंगलवार, अगस्त 25
संघ की पैंतरेबाजी
शायद संघ को ये लगता होगा कि देश के बहुसंख्यकों के साथ चलने में ही उनका हित है क्यों कि वही उनकी ताकत हैं... हो सकता है कि उनकी ये सोच सही भी हो क्यों कि अल्पसंख्यकों का कोई भी संगठन उतना सफल नहीं हो पाया है जितना संघ परिवार... लेकिन संघ परिवार ये भी समझ रहा है कि अगर उसे सत्ता के केन्द्र में मौजूद रहना है तो उसके लिए उसे अल्पसंख्यकों को भी झांसा देना होगा..यही वजह है कि वो कभी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बनाते हैं तो कभी उनके लिए शिविर का आयोजन करते हैं...और हो सकता है उनकी इसी मुहिम की अगली कड़ी जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त बताना हो... अब बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी संघ के इस पैंतरे को जानने लगे हैं.. उन्हे लगने लगा है कि अगले साढ़े चार साल तक तो उन्हे सत्ता का तो सुख मिलने से रहा, तो क्यों ना इस बीच ही राजनाथ, आडवाणी, वेंकैया नायडू, और अरूण जेटली जैसे बरगद के पेड़ के साए से निकला जाए...और अपनी अलग छवि बनाई जाए... ऐसा करने पर हो सकता है संघ के दूसरे धड़े का उन्हे समर्थन मिल जाए... लेकिन उन्हे इससे भी सावधान हो जाना चाहिए कि कहीं इस खेल में उनका और उनकी पार्टी का हाल भस्मासुर जैसा ना हो जाए..
गुरुवार, अगस्त 20
राजीव टाइम्स
आखिर हो भी क्यों नहीं आज सत्ता के केन्द्र में सोनिया गांधी और राहुल गांधी का एक छत्र दबदबा है ऐसे में अगर उनका आर्शिवाद और शुभकामना चाहिए तो राजीव गांधी को तवज्जो तो देना ही पड़ेगा.. मैं ऐसा कहकर राजीव गांधी के कद को छोटा नहीं करना चाहता लेकिन क्या इस तरह से सरकारी पैसों को विज्ञापन के लिए उड़ाना सही है...या फिर विभिन्न मंत्रालय जिस तरह से अपनी योजनाओं का शुभारम्भ आज की तारीख से करने का ऐलान कर रहे हैं क्या वो इसी तारीख का इंतजार कर रहे थे... अगर ऐसा है तो क्या ये भी जनता के साथ धोखा नहीं है... खैर इसके पीछे की सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो सच है कि किसी जमाने में दूरदर्शन पर राजीव गांधी के छाए रहने के कारण उसे राजीव दर्शन का नाम दे दिया गया था... ऐसा ही कुछ आज के अख़बार को भी नाम दिया जा सकता है.. आपके जेहन में कोई नाम आ रहा हो तो मुझे जरूर सुझाईएगा
बुधवार, अगस्त 19
जिन्ना का जिन्न
जिन्ना को लेकर जसवंत सिंह की वकालत बाल ठाकरे को भी नागवार गुजरी है...। जसवंत की किताब में जिन्ना के महिमा मंडल करने पर बाल ठाकरे ने अपनी नाराजगी जताई है....सामना में लिखे लेख में ठाकरे ने कहा कि लाखों निरपराध लोगों का खून बहाने वाला जिन्ना इतिहास पुरूष कैसे हो सकता है.....। ठाकरे ने अपने लेख में जिन्ना को दहशतगर्दी का निर्माता करार देते हुए...जसवंत पर हमला बोला...ठाकरे ने अपने लेख में लिखा है कि कैसे कोई व्यक्ति जिन्ना की तारीफ कर सकता है...ठाकरे ने ये भी साफ किया कि जसवंत की किताब की कीमत बीजेपी को चुकानी होगी..किताब में जसवंत के मुसालमानों को देश में होने वाली परेशानी का जिक्र करना भी ठाकरे को नागावार गुजरा है...ठाकरे ने लेख में लिखा है कि जिस देश के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपि ,चीफ जस्टिस और यहां तक की सुपर स्टार मुसलमान हो सकता है उस देश में मुसलमानों को कैसी समस्या...
मैं भी ये मानता हूं कि जिन्ना साहब एक नेकदिल इंसान थे लेकिन उस वक्त के हालात, और विभाजन के नाम पर हुए तांडव के लिए उन्हे माफ भी नहीं किया जा सकता...ये अलग बात है कि इस विभाजन के लिए वो अकेले ही जिम्मेदार नहीं थे... बल्कि विभाजन के लिए वो लोग भी जिम्मेदार थे जिन्होने इसे होने दिया और इसका विरोध नहीं किया...क्यों कि इसमें उनका भी हित छुपा हुआ था... अगर जिन्ना को सत्ता की भूख थी तो दूसरा पक्ष भी कुर्सी पर आसीन होने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था... लेकिन कहते हैं कि जीतने वाला ही इतिहास लिखता है...इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ आजादी के बाद जो भी इतिहास लिखा गया उस पर कांग्रेस की पकड़ बनी रही... इसलिए अब उस इतिहास के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज को बगावत का दर्जा दे दिया जाता है
सोमवार, अगस्त 17
शाहरूख प्रकरण का सच
शाहरूख ख़ान ने भी इस मामले को खूब तूल दिया और अपने हर बयान में ये बताया कि उन्हे केवल उनके सरनेम ख़ान के कारण पूरी फ़जीहत उठानी पड़ी...ये बयान देने के दौरान वो बार-बार "माइ नेम इज ख़ान" कहना नहीं भूल रहे थे.. जो कि उनकी आने वाली नई फ़िल्म का नाम है... यानि वो इस पूरे मामले को इसलिए भी तूल देना चाह रहे थे ताकि उनकी इस फ़िल्म की मुफ़्त में पब्लिसिटी हो जाए.. मीडिया ने ये अफवाह फैलाई कि शाहरूख ख़ान को न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर दो घंटे के लिए हिरासत में रखकर पूछताछ की गई...जबकि हकीकत इससे बिलकुल जुदा है... दरअसल एयरपोर्ट पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख के साथ उनका सामान नहीं होने के कारण शक के आधार पर दूसरे श्रेणी की सुरक्षा जांच के लिए रोका था... उस दौरान इस जांच के लिए और भी कई लोगों को रोका गया था जिसके कारण शाहरूख की बारी आने में थोड़ा समय लगा...उसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख से सामान्य पूछताछ की..इस पूरी प्रक्रिया में क़रीब 66 मिनट का समय लगा..जो कि बहुत ही सामान्य सी बात है... और बाद में जब सुरक्षाकर्मियों को शाहरूख के रुतबे का पता चला तो उन्होने उन्हे तुरत जाने दिया...
अब सवाल ये उठता है कि इस पूरे मामले में इतनी हायतौबा क्यों मचाई गई... दरअसल शाहरूख को अपनी जांच करवाना इसलिए भी नागवार गुजरा क्यों कि उन्हे भारत में कभी भी इस तरह की स्थिति से दो चार नहीं होना पड़ा था... भारत में ऐसे भी सुरक्षाकर्मियों को इतनी आजादी नहीं दी गई है कि वो सही तरीके से अपना काम कर सकें..उन्हे कदम-कदम पर सिफारिशी लोगों के साथ रियायत बरतनी पड़ती है.. यहां तक की एक छुटभैया नेता के फोन पर ही वो कांप जाते हैं.. और अगर अमेरिका की बात करें तो वहां पर कई लम्हे ऐसे भी आए जब पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर और कैनेडी जैसी हस्तियों को भी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा..जबकि उन्हे सुरक्षा जांच से छूट मिली हुई है..
अब रही बात मीडिया की....कि क्यों उसने इस पूरे मामले पर इतनी हायतौबा मचाई... दरअसल आजकल स्वाइन फ्लू के मामले में वो सनसनी नहीं रही जो उन्हे अच्छी टीआरपी दिला सके... तो बस शाहरूख का मामला आते ही उसे मौका मिल गया और पूरे दिन इस मामले को भुनाते रहे.. और लोगों की भावनाओं से खेलते रहे... कभी इस पूरे मामले को इस्लाम से जोड़ा गया तो कभी देशभक्ति से... कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है राई जैसे इस पूरे मामले को पहाड़ बना कर पेश किया गया... हो सकता है मेरी इस राय से कई लोग सहमत ना हों लेकिन सच तो आख़िर सच है
रविवार, अगस्त 16
हाउस वाइफ को मिलेंगे 6,000 रुपये महीना
इस ख़बर की शुरुआती पंक्तियों को पढ़ते वक्त मैने सोचा कि लगता है हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ये सरकार को ये नया प्रावधान सुझाया है...फिर मुझे लगा कि इस ख़बर से मुझे खुश होना चाहिए की दुखी...क्यों कि मुझे इतना तो यकीन था कि सरकार हाउस वाइफ को 6 हज़ार रुपए महीना तो देने से रही...हां ये जरूर हो सकता है कि सरकार इसी बहाने उनपर इन्कम टैक्स देने का दबाव बना दे..और फिर उनसे मिले राजस्व को नेताओं की मौज मस्ती पर उड़ा दे...खैर मेरी सांस में सांस तब आई जब देखा कि ये मामला महज मुआवजे का है और कोर्ट ने एक अनुमान के आधार पर हाउस वाइफ की ये आमदनी बताई...हां उसने इतना जरूर किया सुप्रीम कोर्ट के 3 हज़ार रुपए प्रति महीने की आमदनी के फ़ैसले को बदलते हुए 6 हज़ार प्रति महीने कर दिया...चलिए कम से कम न्यायपालिका को तो महंगाई का अहसास हुआ
शनिवार, अगस्त 15
सूख जाएगी गंगा
हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकल कर करीब 200 किलोमीटर का सफर तय करके गंगा नदी गोमुख होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। इससे पहले गंगा नदी में 6 नदियों का विलय होता है...अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा से मिलती है...उसके बाद थोड़ा आगे चलकर नंदप्रयाग में नंदाकिनी नदी का विलय होता है...कर्णप्रयाग में पिंडर नदी मिलती है...रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी से मिलन होता है... आखिर में देव प्रयाग में भागिरथी से मिलकर गंगा नदी अपने वास्तविक रूप में आती है और शिवालिक पहाड़ी से होती हुई हरिद्वार में अवतरित होती है।
इसके बाद ये नदी क़रीब 2,510 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस दौरान ये मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरती है। इसमें से हरिद्वार, इलाहाबाद और वाराणसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं से काफी जुड़े हुए हैं। ये गंगा नदी भारत की लगभग आधी आबादी के लिए जीवन दायिनी बनी हुई है। कहीं इसके पानी का इस्तेमाल पीने के लिए हो रहा है तो कहीं इससे निकाली गई नहरों से सिंचाई की जा रही है। और अगर धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो हिन्दुओं ने इसे माता का दर्जा दिया है और वे इसकी पूजा करते हैं। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थों में भी इस नदी का जिक्र मिलता है।
अब वही गंगा मैया इतिहास के पन्नों में सिमटने की तैयारी कर रही है और इसकी वजह है हमलोगों के पाप जो ग्लोबल वार्मिंग बनकर पल पल इसे आखिरी मुकाम की ओर ढ़केल रहे हैं। जी हां वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग को ही गंगा नदी के सूखने की वजह बताई है। उनके मुताबिक गंगा नदी जिस गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है वो तेजी से पिघल रहा है। गंगा नदी का क़रीब 70 फीसदी पानी इस ग्लेशियर से आता है और ये हर साल 50 यार्ड की रफ़्तार से पिघल रहा है। जो कि दस साल पहले किए गए अनु्मान से दोगुना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार इस तरह से जारी रही तो 2030 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएगा और सूखने लगेगी गंगा नदी। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक उस स्थिति में गंगा नदी मौसमी नदी बनकर रह जाएगी...जो केवल बरसात के मौसम में ही नज़र आएगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो जरा सोचिए उस पूरी आबादी का क्या होगा जो इस जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी के सहारे जी रहे हैं साथ ही उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जिनकी आस्था इस नदी से जुड़ी हुई है....इसलिए यही सही वक्त है कि हम सचेत हो जाएं और गंगा नदी को बचाने का संकल्प लें...
आज़ादी के मायने
एयर कंडीशन्ड दफ़्तरों और घरों में बैठकर आजादी का मतलब निकालना काफी आसान होता है...लेकिन आजाद फिज़ा और आजाद वातावरण में आजादी की बात करना आजकल थोड़ा मुश्किल हो गया है..अगर आप घर से बाहर निकल कर आजादी की सांस लेना चाहते हैं तो आप ऐसा नहीं कर सकते क्यों कि खुली हवा में फैक्ट्रियों और गाड़ियो ने ज़हर घोल दी है...क्यों कि विकास की आंधी और शासन-प्रशासन ने उन्हे प्रदूषण फैलाने की आजादी दे दी है...
आजकल लड़कियां जब अपने फैशन की आजादी के साथ घर से बाहर कदम रखती है तो उसे हर तरफ से आजाद ख़्यालात से रूबरू होना पड़ता है क्यों कि खुद को मर्द समझने वाले मनचले अपने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ उन्हे हर नुक्कड़ पर खड़े मिल जाते हैं..क्यों कि इन मनचलों को हमारे समाज और पुलिस ने ऐसा करने की आजादी दे रखी है...यही हाल दूसरे अपराधियों का भी है जो घर में घुसकर और राह चलते लोगों को लूट रहे हैं क्यों कि उन्होने भी पुलिस महकमे को अपनी आजादी की फीस दे रखी है...और तो और आज की तारीख में शासन के कमजोर हाथ के नीचे पुलिस भी आजादी से गुंडागर्दी कर रही है..
अगर आप समझते हैं कि आप आजाद देश के आजाद नागरिक हैं तो ये गलतफ़हमी सरकारी दफ़्तरों में बैठे बाबू लोग दूर कर देंगे..क्यों कि आपको वहीं जाकर पता लगेगा कि आपको अपनी आजादी पाने के लिए कितना शुल्क अदा करना पड़ेगा..आखिर हो भी क्यों नहीं बाबू लोग तो रिश्वत लेने की आजादी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं..अगर उन्हे रोकने की कोशिश की गई तो शायद वो लोग मानवाधिकार आयोग का दरवाजा भी खटखटा दें...
नेताओं की बात करें तो वो तो खुद को आजादी के ठेकेदार ही समझते हैं..उन्हे तो हर बात की आजादी है वो चाहें तो घोटाला करें, वो चाहें तो संसद में सवाल उठाने के लिए पैसे लें, वो चाहें तो सरकार को बचाने के लिए सांसदों की ख़रीद-फरोख़्त करें, वो चाहें तो गुंडागर्दी करें, वो चाहें तो किसी की हत्या कर दें...लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता..क्यों कि शायद उन्हे ऐसा करने की आजादी मिली हुई है...ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं ऐसे आजादी के परवाने हमारे समाज में ना जाने कितने मौजूद हैं..
इतना सब कुछ होने के बावजूद हम आज आज़ाद हैं क्यों कि हमारे अंदर आज़ादी का जज़्बा है..और हमारे ख़्यालात आजाद हैं...बस जरूरत है समाज में मौजूद तथाकथित आज़ादी के दिवानों के पर कतरने की...तभी हमारा मुल्क वाकई आज़ाद होगा...जय हिन्द




