जिन्ना जब तक ज़िंदा रहे तब तक राजनीतिक विवादों को जन्म देते रहे...वो चाहे भारत-पाक विभाजन हो या फिर विभाजन के बाद उनका पश्चाताप...अब जबकि उनकी मौत को कई दशक बीत चुके हैं तो एक बार फिर जिन्ना ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है... इस बार इस विवाद की नैया को बीजेपी के जसवंत सिंह खे रहे हैं...इससे पहले जिन्ना के जिन्न ने आडवाणी को काफी परेशान किया था...हालात ऐसे हो गए थे कि आडवाणी को बीजेपी में ही दरकिनार कर दिया गया था... लेकिन जसवंत सिंह ने जब अपनी किताब में जिन्ना को महापुरूष का दर्जा दे दिया तो ऐसा लगा कि उन्होने आडवाणी प्रकरण से कुछ नहीं सीखा...बस उनके हित में ये है कि वो बीजेपी में किसी पद पर आसीन नहीं हैं, नहीं तो उनसे भी इस्तीफ़ा मांग लिया जाता...जसवंत सिंह ने अपनी किताब में भारत-पाक विभाजन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल को जिम्मेदार ठहराया है...इसके अलावा उन्होने कई मामलों में कांग्रेस की खिंचाई भी कर दी है..उनके इस बयान से कांग्रेस का चिढ़ना तो लाजिमी ही था..लेकिन उनकी पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी ये बयान दे दिया कि जसवंत की किताब में लिखी बातों से वो सहमत नहीं है और किताब में जिन्ना का महिमामंडन करना गलत है। राजनाथ ने ये भी कहा कि किताब में जो बात सरदार पटेल के लिए लिखी गई हैं वो भी बिलकुल सही नहीं है और पार्टी उनके इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखती।
जिन्ना को लेकर जसवंत सिंह की वकालत बाल ठाकरे को भी नागवार गुजरी है...। जसवंत की किताब में जिन्ना के महिमा मंडल करने पर बाल ठाकरे ने अपनी नाराजगी जताई है....सामना में लिखे लेख में ठाकरे ने कहा कि लाखों निरपराध लोगों का खून बहाने वाला जिन्ना इतिहास पुरूष कैसे हो सकता है.....। ठाकरे ने अपने लेख में जिन्ना को दहशतगर्दी का निर्माता करार देते हुए...जसवंत पर हमला बोला...ठाकरे ने अपने लेख में लिखा है कि कैसे कोई व्यक्ति जिन्ना की तारीफ कर सकता है...ठाकरे ने ये भी साफ किया कि जसवंत की किताब की कीमत बीजेपी को चुकानी होगी..किताब में जसवंत के मुसालमानों को देश में होने वाली परेशानी का जिक्र करना भी ठाकरे को नागावार गुजरा है...ठाकरे ने लेख में लिखा है कि जिस देश के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपि ,चीफ जस्टिस और यहां तक की सुपर स्टार मुसलमान हो सकता है उस देश में मुसलमानों को कैसी समस्या...
मैं भी ये मानता हूं कि जिन्ना साहब एक नेकदिल इंसान थे लेकिन उस वक्त के हालात, और विभाजन के नाम पर हुए तांडव के लिए उन्हे माफ भी नहीं किया जा सकता...ये अलग बात है कि इस विभाजन के लिए वो अकेले ही जिम्मेदार नहीं थे... बल्कि विभाजन के लिए वो लोग भी जिम्मेदार थे जिन्होने इसे होने दिया और इसका विरोध नहीं किया...क्यों कि इसमें उनका भी हित छुपा हुआ था... अगर जिन्ना को सत्ता की भूख थी तो दूसरा पक्ष भी कुर्सी पर आसीन होने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था... लेकिन कहते हैं कि जीतने वाला ही इतिहास लिखता है...इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ आजादी के बाद जो भी इतिहास लिखा गया उस पर कांग्रेस की पकड़ बनी रही... इसलिए अब उस इतिहास के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज को बगावत का दर्जा दे दिया जाता है
बुधवार, अगस्त 19
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