मंगलवार, अगस्त 25

संघ की पैंतरेबाजी

जिन्ना साहब वाकई धर्मनिरपेक्ष थे और वो राष्ट्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे...और अगर सवाल भारत-पाक विभाजन का है तो उसके लिए महात्मा गांधी जिम्मेदार थे..अगर वो चाहते तो इस विभाजन को रोक सकते थे.. ये मैं नहीं बल्कि आरएसएस के पूर्व अध्यक्ष के.सी.सुदर्शन कह रहे हैं। वो जिन्ना पर जसवंत सिंह, सुधीर कुलकर्णी और अरुण शौरी की राय से सहमत हैं... अगर ऐसा है तो वो जिन्ना पर दिए गए आडवाणी की राय से भी सहतम होंगे... फिर भी उनके संघ के अध्यक्ष रहते हुए इस मामले पर खूब हंगामा हुआ.. आडवाणी जी को अपने बयान पर संघ को सफाई देनी पड़ी.. तो क्या ऐसा मान लिया जाए कि संघ में कई विचारधाराओं को मानने वाले लोग हैं फिर हिन्दुत्व का मुखौटा पहनना उनकी मजबूरी बन गई है...

शायद संघ को ये लगता होगा कि देश के बहुसंख्यकों के साथ चलने में ही उनका हित है क्यों कि वही उनकी ताकत हैं... हो सकता है कि उनकी ये सोच सही भी हो क्यों कि अल्पसंख्यकों का कोई भी संगठन उतना सफल नहीं हो पाया है जितना संघ परिवार... लेकिन संघ परिवार ये भी समझ रहा है कि अगर उसे सत्ता के केन्द्र में मौजूद रहना है तो उसके लिए उसे अल्पसंख्यकों को भी झांसा देना होगा..यही वजह है कि वो कभी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बनाते हैं तो कभी उनके लिए शिविर का आयोजन करते हैं...और हो सकता है उनकी इसी मुहिम की अगली कड़ी जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त बताना हो... अब बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी संघ के इस पैंतरे को जानने लगे हैं.. उन्हे लगने लगा है कि अगले साढ़े चार साल तक तो उन्हे सत्ता का तो सुख मिलने से रहा, तो क्यों ना इस बीच ही राजनाथ, आडवाणी, वेंकैया नायडू, और अरूण जेटली जैसे बरगद के पेड़ के साए से निकला जाए...और अपनी अलग छवि बनाई जाए... ऐसा करने पर हो सकता है संघ के दूसरे धड़े का उन्हे समर्थन मिल जाए... लेकिन उन्हे इससे भी सावधान हो जाना चाहिए कि कहीं इस खेल में उनका और उनकी पार्टी का हाल भस्मासुर जैसा ना हो जाए..

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