सोमवार, अगस्त 10

आज़ादी की घटती कीमत

15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस..ये वो दिन है जिसके लिए आजादी के दीवानों ने बड़ी कीमत अदा की..उन्होने आजादी का सौदा अपनी जान से किया..उन्होने तिरंगे का मान रखने के लिए सीने पर ना जाने कितनी गोलियां खाई..शायद उन्होने सोचा होगा कि आने वाली पीढ़ी आजादी की इस कीमत को याद रखेंगे...पर ऐसा कुछ नहीं हुआ...कल हमारी सोसायटी में एक लड़का हाथों में छोटे-छोटे झंडे लेकर बेचने आया था..उसे बड़ी आशा थी कि सोसायटी में रहने वाले और लंबी गाड़ी में घूमने वाले लोग उसके सारे झंडे ख़रीद लेंगे...उसने अपने झंडे की कीमत रखी थी एक रुपया...इस एक रुपए में उसे बीस पच्चीस पैसे का मुनाफा होना था...वो हाथों में ढ़ेर सारे झंडे लेकर सोसायटी में घूम रहा था..इसी बीच मुंह में पांच रुपए का सिगरेट दबाए एक शख़्स उसके पास पहुंचा और उसने पांच झंडे लेकर तीन रुपए लड़के की तरफ बढ़ा दिया...लेकिन लड़के ने उसे झंडा देने से मना कर दिया..लड़के का ये रवैया उस शख़्स को रास नहीं आया और उसने उसे दो चार भद्दी गालियां देते हुए सोसायटी से बाहर निकाल दिया...इस जनाब के रवैये से मुझे अहसास हुआ कि हमारे तिरंगे की कीमत भी अब गिरने लगी है...उस अनपढ़ गंवार लड़के की नज़रों में झंडे की कीमत भले ही एक रुपए थी लेकिन ऊंची सोसायटी में रहने वाले पढ़े-लिखे लोगों को तिरंगे के इस कीमत पर भी ऐतराज था...

ऐसा नहीं है कि ये कुछ लोगों की मानसिकता है...मुझे याद आ रहे हैं कॉलेज के वो दिन जब मैं दिल्ली युनिवर्सिटी के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहा था...उन दिनों मैने और मेरे कुछ दोस्तों ने कॉलेज में स्वतंत्रता दिवस को धूमधाम से मनाने का निश्चय किया...हमलोगों ने अपना पॉकेट मनी मिलाया और फिर कॉलेज के दूसरे साथियों से भी चंदा करने के लिए निकल पड़े..हमें उम्मीद थी कि हमारी मेहनत रंग लाएगी...लेकिन सुबह में बनी हमारी ये उम्मीद शाम तक टूटने लगी थी..हालात ऐसे बन गए थे कि कॉलेज के लड़के-लड़कियां हमें देखते ही कन्नी काटने लगे थे...और जो अन्जाने में कन्नी नहीं काट पाते थे वो बमुश्किल अपने पॉकेट से दो-तीन रुपए निकालकर हमारे हाथ पर रख देते थे..ख़ैर किसी तरह से हमने सारी व्यवस्थाएं की और सादे तरीके से स्वतंत्रता दिवस मनाया..इस वाकये को गुजरे कुछ ही दिन हुए थे कि कॉलेज के कुछ लड़कों ने कॉलेज में रेन डांस का आयोजन किया...हमें आश्चर्य तो तब हुआ जब कॉलेज के हमारे साथियों ने इसके लिए बिना कहे पचास-पचास, सौ-सौ के नोट आयोजकों के हवाले कर दिए...उस पल भी मुझे आज़ादी की गिरती कीमत का अंदाजा हुआ....

पिछले साल मैं अपनी गाड़ी की सर्विसिंग करान के लिए एक प्रतिष्ठित सर्विस सेंटर पर गया था...वहां पर मैने देखा कि कई छोटे-छोटे तिरंगे गाड़ियों के आस-पास फेंके हुए थे..जब मैं उन्हे उठाने लगा तो वहां बैठे सर्विस सेंटर के एक कर्मचारी ने कहा..साहब आप बेकार में ही परेशान हो रहे हैं..थोड़ी देर में कचरा वाला आएगा और ये सब उठा कर ले जाएगा..वैसे भी 26 जनवरी को नए झंडे खरीदे जाएंगे..ये पुराने वाले झंडे तो बेकार हो गए हैं। उस पल भी मुझे अहसास हुआ कि अपनी आजादी कितनी सस्ती हो गई है

4 टिप्‍पणियां:

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  2. Haan..gar log apnee aazaadee kee qeemat nahee karenge, to wo ghattee hee rahegee...afsos!

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  3. आप की बात सही है | आजाद देश में पैदा हुए लोगों को आजादी की कीमत का एहसास नहीं है |

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  4. acha laga aapke is nibndh ko padkar ...
    mujhe aapne school ke time ki ek upniyas yaad aa gai jiska {naam adhi raat ka suraj} jisme azadi ko apne andhurani sobhav se mana he jo azadi he uske intezar ko bahut khubsurati se doraha he... ho sake to aap padne ki koshish kijiyega aap ko or likhne ko or apne se smwad karne ko concretes(row material ) milega ...............likhte rahe likhne se barikiyat or gairahi aati hae ........

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