बुधवार, सितंबर 30
क्वात्रोकी को क्लीन चिट
सोमवार, सितंबर 21
अपनी डफली अपना राग
हाफ़िज़ सईद को नज़रबंद करने का मामला ऐसी ही एक कोशिश है... पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाने के लिए सईद को उनके घर में ही नज़रबंद कर दिया है... लेकिन उसके ख़िलाफ़ जो आरोप लगाए हैं वो बेहद ही बचकाना है... दरअसल इसके पीछे पाकिस्तान का एक स्वार्थ छुपा हुआ है.. पाकिस्तान ने सईद को भड़काऊ भाषण देने के आरोप में नज़रबंद किया है...और पाक चाहता है कि ईद के मौके पर सईद कोई ऐसा भड़काऊ भाषण ना दे दें जिससे मुल्क में दंगा भड़के... लेकिन पाकिस्तान ने इस कार्रवाई को ऐसे पेश किया जैसे वो मुंबई हमला मामले के बारे में काफी गंभीरता से कार्रवाई कर रहा है... पाकिस्तान के इस फरेब को भारत के राजनेताओं ने भी सही मान लिया और जुट गए अपनी कूटनीतिक ज्ञान का बखान करने में... अगर हमारे राजनेताओं में इतना ही कूटनीतिक ज्ञान होता तो 16 जुलाई को शर्म अल शेख में पाकिस्तान के साथ जो साझा बयान जारी हुआ वो नहीं हुआ होता.. ख़ैर राजनेताओं का क्या.. वो तो अपनी डफली अपना राग के लिए मशहूर तो हैं ही... कम से हम जैसे आम लोग उनके बहकावे में ना आएं... यही हमारी सेहत के लिए ठीक रहेगा
गुरुवार, सितंबर 17
हंगामा है क्यों बरपा ?
लेकिन इन मामलों में ना तो गार्ड चौकस था और ना ही रेलवे सुरक्षा बल.. पर जब बात राहुल बाबा की हो तो पूरी चौकसी तो बरतनी ही पड़ती है.. क्यों कि राहुल बाबा भले ही दलितों के घर में खाते हों... और शताब्दी में बैठकर आम लोगों के साथ रेल यात्रा करते हों.. पर ऐसा करने से कोई आम आदमी तो हो नहीं जाता... प्रशासन के बाबुओं को भी ये पता है.. शायद यही वजह है कि वो राहुल बाबा को आम आदमी समझने की भूल नहीं करना चाहते हैं.. और वो पथराव जैसी छोटी बात को भी तूल देने में लगे हुए हैं... रही बात कांग्रेस के किफायत अभियान की तो... शायद कांग्रेसी ये भूल जाते हैं कि जब वो इकॉनॉमी क्लास में या फिर रेल से यात्रा करते हैं तो उनके आसपास की सीट उनके सुरक्षाकर्मियों के लिए रिजर्व की जाती है... और अगर इस पूरे खर्चे को जोड़ा जाए तो वो बिजनेस क्लास से कहीं ज़्यादा महंगा साबित होता है... और आम आदमियों को इससे परेशानी होती है वो अलग... ऐसे में अगर राहुल बाबा और सोनिया जी आम आदमियों के बारे में सोचना चाहती हैं तो उन्हे आम आदमियों के दिल के बजाए पेट का ख्याल करना चाहिए... क्यों कि अगर वो बिजनेस क्लास में ही बैठकर लोककल्याण के बारे में बेहतर योजनाएं तैयार कर पाएं तो इससे आम आदमियों का भला होगा.. बजाए इसके कि आम आदमियों के साथ सफर करके पूरा ध्यान उनकी सहानुभूति बटोरने में लगा रहे
मंगलवार, सितंबर 8
मंत्रियों की ऐय्याशी
यूपीए सरकार के मंत्रियों की शानो शौकत यहीं ख़त्म नहीं होती इस फेरहिस्त में विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर का नाम भी है..जो ताज पैलेस के वीआईपी सुइट में ठहरे थे..इनसे भी केरल हाउस में ठहरने की गुजारिश की गई थी... लेकिन उन्होने इस गुजारिश को ठुकरा कर तीन महीने से प्रति दिन 40 हज़ार रुपये बतौर किराया देना ज्यादा मुनासिब समझा.. भला हो वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का जिन्होने सरकारी ख़जाना ख़त्म होता हुआ देख.. इन मंत्रियों को होटल छोड़ देने की मिन्नत करना शुरू कर दिया.. उनकी मिन्नते रंग लाई और आज आखिरकार इन मंत्रियों ने होटल छोड़ दिया...अब तो आप समझ ही सकते हैं कि जिस सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों का ये हाल है... वो सरकार देश के वित्तीय हालात को लेकर कितनी संजीदा हो सकती है
शुक्रवार, सितंबर 4
टीआरपी के लिए @#&*$ कुछ भी करेगा
खैर शाम तक ज़्यादा से ज़्यादा टीआरपी बटोरने का खेल चलता रहा... हर चैनल कुछ हटकर यानि एक्सकुलुसिव चलाने की फिराक में लगा हुआ था... लेकिन दोपहर से लेकर देर शाम तक घटनाक्रम में बहुत तब्दीली नहीं आई थी... ऐसे में दर्शक भी न्यूज़ चैनल से हटने लगे थे क्यों उन्हे भी हर पल कुछ नया और कुछ ताज़ा देखने की आदत है... इसकी भनक शायद टीआरपी रेटिंग में दूसरे स्थान पर काबिज एक बड़े न्यूज़ चैनल को लग चुकी थी... उसने फिर एक तुरूप का पत्ता खेला और रात साढ़े नौ बजे उसने ऐसा ब्रेकिंग देना शुरू किया जो किसी भी चैनल के पास नहीं था... इस न्यूज़ चैनल के एंकर ने दावे के साथ कहना शुरू किया की आंध्रप्रदेश के सीएम राजशेखर रेड्डी बिलकुल सुरक्षित हैं... स्थानीय आदिवासियों ने उन्हे देखा है.. इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होने यहां तक दावा कर दिया कि मुख्यमंत्री साहब की वन विभाग के कर्मचारियों से बातचीत भी हुई है... और उन्होने कहा है कि वो पूरी तरह सुरक्षित हैं और लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।
पहले तो लोगों को इस ख़बर पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन लोगों को विश्वास दिलाने के लिए वो न्यूज़ चैनल अपने संपादक महोदय को भी लोगों के आगे कर दिया... संपादक महोदय ने भी दर्शकों की आंख में आंख डालकर दावे के साथ कहा कि रेड्डी साहब पूरी तरह सुरक्षित हैं... दर्शकों ने मजबूरन उनकी बातों पर विश्वास करना शुरू कर दिया... अब बारी कुछ दूसरे न्यूज चैनलों की थी.. उन्होने भी अपनी टीआरपी खिसकते देख उसे बड़े न्यूज चैनल का अनुसरण करना शुरू कर दिया... हालांकि इस दौड़ में कुछ न्यूज़ चैनल शामिल नहीं हुए और उन्होने अपनी जिम्मेदारी समझी... दूसरे दिन सुबह होते होते धटनाक्रम पर छाया धुंध साफ होने लगा... बचाव दल के लोगों को हेलिकॉप्टर का मलबा मिल गया था... और थोड़ी देर में उन्हे मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी समेत हेलिकॉप्टर में सवार सभी पांच लोगों के शव भी मिल गए.. इस ख़बर को भी उस तथाकथित बड़े चैनल ने जोर-शोर से चलाया और अपनी शाम वाली गलती को छिपाने के लिए कई ड्रामे भी किए... हो सकता है कि इस बार की टीआरपी रेटिंग में अपने उस आधे घंटे की टीआरपी की बदौलत वो सर्वोच्च स्थान भी हासिल कर ले... और शायद उसे इस बात का एहसास भी कभी ना हो कि उसने उस आधे घंटे में कितनी संवेदनाओं, कितने भावनाओं और पत्रकारिता के ना जाने कितने उसूलों का क़त्ल कर दिया है
गुरुवार, अगस्त 27
सच की क़ीमत
अब वो दिन दूर नहीं जब पति-पत्नी के बीच का झगड़ा इस लैब तक पहुंच जाएगा... लड़के-लड़कियां अपने पॉकेट मनी का इस्तेमाल भी अपनी गर्ल फ्रेंड या ब्वॉय फ्रेंड के चेहरे से नकाब हटाने के लिए करेंगे...बच्चे का असली बाप या मां कौन है इसका फ़ैसला भी लैब ही करेगा। अब कोई भी शख़्स ज़मीन या फ्लैट ख़रीदने से पहले बेचने वाले को इसी लैब में लेकर आएगा ताकि वो फर्जीवाड़े से बच सके...हर जनता चाहेगी कि उसके नेता चुनाव लड़ने से पहले इस लैब में जाकर उनके सवालों का जवाब दें..हर ठेकेदार को इस लैब में बैठाकर उसकी कारगुजारी के बारे में पूछा जाएगा...ये ऐसे तमाम पहलू हैं जो कि इस लैब को बेहतर समाज के लिए जरूरी बनाते हैं..लेकिन क्या ये सिलसिला वाकई यहीं पर आकर रुक जाएगा...? शायद नहीं क्यों कि सच हमेशा कुछ बेहतर ही करे ऐसा जरूरी नहीं है... कई बार कई झूठ कई परिवारों और लोगों के संबंधों में मिठास घोलकर रखता है.. और अगर इस झूठ को उनके दरम्यान से निकाल दिया जाए तो उनके संबंधों में जो कड़वाहट आएगी उसका जिम्मेदार भी यही लैब होगा
बुधवार, अगस्त 26
एक मुलाक़ात गणपति बप्पा से
कल रात मेरे पास गन्नू भाई मुंह पर स्वाइन फ्लू का मास्क लगाकर आए..अरे आप कन्फ्यूज मत होईए..गन्नू भाई से मेरा आशय गणपति बप्पा से है.. तो चलिए मुलाक़ात की बात को आगे बढ़ाते हैं.. गन्नू भाई काफी थके हुए पसीने से तर-बतर थे.. उन्होने अपनी पीठ पर काफी बड़ा सा बैग टांगा हुआ था.. लेकिन एक बात जो मुझे काफी अजीब लगी, वो था उनका 8 पैक एब्स..उसे देखकर मैं काफी हैरान था क्यों कि मेरे मन में जो उनकी छवि थी उसमें उनकी अच्छी खासी तोंद निकली हुई थी...मुझे चौंकते हुए देखकर उन्होने अपनी पीठ पर से अपना भारी बैग उतारा और धम्म से सोफे पर पसर गए... मैने उन्हे पानी पिलाया और खाने के लिए थाली भरकर लड्डू परोस दिया... पानी तो उन्होने पी लिया लेकिन लड्डू खाने से मना कर दिया..बाद में उन्होने बताया कि आजकल वो डायटिंग कर रहे हैं...
मुझे लगा कि मेरे स्वागत सत्कार से वो प्रसन्न हो गए होंगे और अब वो अपने भारी बैग से निकालकर मुझे कुछ तोहफे देंगे... ऐसा ख़्याल आते ही मैं हसरत भरी नज़रों से उनके बैग की ओर एकटक देखने लगा... गन्नू भाई तो अंतर्यामी हैं उन्होने मेरे भाव को ताड़ लिया और अपना बैग खोलने लगे... जैसे-जैसे उनके बैग की गांठ खुलती जा रही थी वैसे-वैसे मेरे दिल की धड़कने तेज होती जा रही थी.. मन ही मन मैने दिल्ली के पॉश इलाके में पांच सौ गज का प्लॉट खरीद लिया था..और जबतक उनके बैग की आखिरी गांठ खुलती तबतक मैने उस प्लॉट पर एक आलीशान बंगला और उस बंगले के गैरेज में दो-तीन लंबी गाड़ियां पार्क कर चुका था..
आख़िरकार इंतजार की घड़ियां ख़त्म हुई.. गन्नू भाई ने उस बैग से सामान निकालना शुरू किया... उन सामानों को देखकर मेरे अरमानों पर एक साथ ना जाने कितना लीटर पानी फिर गया था... उस पानी में मेरा पांच सौ गज का प्लॉट, आलीशान बंगला और लंबी गाड़ियां एक झटके में बह गए.. ऐसा लग रहा था जैसे मैं बिहार के सुपौल ज़िले में खड़ा हूं और एक बार फिर कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल कर सबकुछ अपने में समेट लिया हो... अचानक गन्नू भाई की थकी हुई आवाज से मैं अपने ख़्यालों से वापस आया...मेरे सामने गन्नू भाई अपने बैग से निकाले गए, एके-47, बैट, टीम इंडिया की जर्सी, फुटबॉल जैसे अनगिनत सामानों के साथ खड़े थे.. मैने जब उनसे उन सामानों के बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि ये सब सामान उनके अति उत्साहित भक्तों ने दिया है...उन्होने बताया कि कैसे गणेश उत्सव के दौरान कुछ नया करने की होड़ में उनके भक्तगण उनको कलयुगी बनाने पर तुले हुए हैं..
हद तो तब हो गई जब उनके कुछ भक्तों ने उन्हे मूषकराज से उठा कर डायनासोर पर बैठा दिया... मैने भी थोड़े मजाकिया अंदाज में गन्नू भाई से पूछ ही लिया कि उन्हे डायनासोर पर बैठने में परेशानी क्यों हो रही है..क्यों कि उनका डिल-डौल तो डायनासोर पर बैठने के लिए बिलकुल फिट है..मुझे लगा कि शायद गन्नू भाई डायनसोर की उबड़-खाबड़ पीठ से परेशान हो रहे होंगे..लेकिन ऐसा नहीं था उनकी शिकायत थी पृथ्वीलोक पर हो रही पार्किंग की समस्या से..उन्होने बताया कि डायनासोर के मुक़ाबले चूहे को पार्क करना काफी आसान है.. और चूहे पर सवारी करना सस्ता भी है। इस बारे में वो आगे कुछ बताते इससे पहले ही मैने उनसे मेरे घर पधारने की वजह पूछ ली...लेकिन इस सवाल पर गन्नू भाई की प्रतिक्रिया को देखकर लगा जैसे वो इसी सवाल का इंतजार कर रहे थे..उन्होने सवाल ख़त्म होते ही बताया कि कैसे इंसानों की नित नई जिम्मेदारी संभालते-संभालते वो परेशान हो गए हैं...जब भी कोई नई मुसीबत आती है तो इंसान गणेश उत्सव में मुंह लटकाए हुए उनके पास पहुंच जाते हैं और फिर उन्हे कभी, बैट पकड़ा देते हैं तो कभी आतंकवादियों से लड़ने के लिए एके-47 थमा देते हैं..और तो और उन्हे ऐसे मॉडर्न पोशाक पहना देते हैं कि स्वर्ग लोक में जहां देखो वहीं देवतागण उनकी खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं..
गन्नू भाई ने ये भी बताया कि उन्हे गणेश उत्सव के दौरान क्यों डायटिंग करनी पड़ रही है.. उन्होने बताया कि कैसे मूर्तिकार उनके ऊपर प्लास्टर ऑफ पेरिस थोप कर उनको और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं...और इसी पीओपी के कारण वो पूरे दस दिन कुछ नहीं खा पाते हैं...गन्नू भाई चाहते थे कि मैं मीडिया के माध्यम से इस मामले में जागरुकता फैलाऊं ताकि उनके भक्तजन अपनी समस्याओं का ठीकरा उनपर फोड़ने के बजाए अपने स्तर पर भी उनसे निपटने की कोशिश करें...वैसे भगवान तो अंतर्यामी हैं ही उन्हे कुछ बताने की जरूरत भी नहीं.. वो तो बिना बताए ही अपने भक्तों का कष्ट हर लेते हैं...फिर उनके प्रतिमा से खिलवाड़ करना आस्था के साथ खिलवाड़ करने जैसा ही है..मैं गन्नू भाई से कुछ और सवाल पूछ पाता उससे पहले ही बारिश शुरू हो गई..जबतक मैं कुछ समझ पाता..मेरी आंख खुल गई और सामने हाथ में पानी का गिलास लिए हुए मेरी भतीजी खड़ी थी... तब जाकर मुझे लगा कि गणपति बप्पा से मेरी मुलाक़ात महज एक सपना था
मंगलवार, अगस्त 25
संघ की पैंतरेबाजी
शायद संघ को ये लगता होगा कि देश के बहुसंख्यकों के साथ चलने में ही उनका हित है क्यों कि वही उनकी ताकत हैं... हो सकता है कि उनकी ये सोच सही भी हो क्यों कि अल्पसंख्यकों का कोई भी संगठन उतना सफल नहीं हो पाया है जितना संघ परिवार... लेकिन संघ परिवार ये भी समझ रहा है कि अगर उसे सत्ता के केन्द्र में मौजूद रहना है तो उसके लिए उसे अल्पसंख्यकों को भी झांसा देना होगा..यही वजह है कि वो कभी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बनाते हैं तो कभी उनके लिए शिविर का आयोजन करते हैं...और हो सकता है उनकी इसी मुहिम की अगली कड़ी जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त बताना हो... अब बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी संघ के इस पैंतरे को जानने लगे हैं.. उन्हे लगने लगा है कि अगले साढ़े चार साल तक तो उन्हे सत्ता का तो सुख मिलने से रहा, तो क्यों ना इस बीच ही राजनाथ, आडवाणी, वेंकैया नायडू, और अरूण जेटली जैसे बरगद के पेड़ के साए से निकला जाए...और अपनी अलग छवि बनाई जाए... ऐसा करने पर हो सकता है संघ के दूसरे धड़े का उन्हे समर्थन मिल जाए... लेकिन उन्हे इससे भी सावधान हो जाना चाहिए कि कहीं इस खेल में उनका और उनकी पार्टी का हाल भस्मासुर जैसा ना हो जाए..
गुरुवार, अगस्त 20
राजीव टाइम्स
आखिर हो भी क्यों नहीं आज सत्ता के केन्द्र में सोनिया गांधी और राहुल गांधी का एक छत्र दबदबा है ऐसे में अगर उनका आर्शिवाद और शुभकामना चाहिए तो राजीव गांधी को तवज्जो तो देना ही पड़ेगा.. मैं ऐसा कहकर राजीव गांधी के कद को छोटा नहीं करना चाहता लेकिन क्या इस तरह से सरकारी पैसों को विज्ञापन के लिए उड़ाना सही है...या फिर विभिन्न मंत्रालय जिस तरह से अपनी योजनाओं का शुभारम्भ आज की तारीख से करने का ऐलान कर रहे हैं क्या वो इसी तारीख का इंतजार कर रहे थे... अगर ऐसा है तो क्या ये भी जनता के साथ धोखा नहीं है... खैर इसके पीछे की सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो सच है कि किसी जमाने में दूरदर्शन पर राजीव गांधी के छाए रहने के कारण उसे राजीव दर्शन का नाम दे दिया गया था... ऐसा ही कुछ आज के अख़बार को भी नाम दिया जा सकता है.. आपके जेहन में कोई नाम आ रहा हो तो मुझे जरूर सुझाईएगा
बुधवार, अगस्त 19
जिन्ना का जिन्न
जिन्ना को लेकर जसवंत सिंह की वकालत बाल ठाकरे को भी नागवार गुजरी है...। जसवंत की किताब में जिन्ना के महिमा मंडल करने पर बाल ठाकरे ने अपनी नाराजगी जताई है....सामना में लिखे लेख में ठाकरे ने कहा कि लाखों निरपराध लोगों का खून बहाने वाला जिन्ना इतिहास पुरूष कैसे हो सकता है.....। ठाकरे ने अपने लेख में जिन्ना को दहशतगर्दी का निर्माता करार देते हुए...जसवंत पर हमला बोला...ठाकरे ने अपने लेख में लिखा है कि कैसे कोई व्यक्ति जिन्ना की तारीफ कर सकता है...ठाकरे ने ये भी साफ किया कि जसवंत की किताब की कीमत बीजेपी को चुकानी होगी..किताब में जसवंत के मुसालमानों को देश में होने वाली परेशानी का जिक्र करना भी ठाकरे को नागावार गुजरा है...ठाकरे ने लेख में लिखा है कि जिस देश के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपि ,चीफ जस्टिस और यहां तक की सुपर स्टार मुसलमान हो सकता है उस देश में मुसलमानों को कैसी समस्या...
मैं भी ये मानता हूं कि जिन्ना साहब एक नेकदिल इंसान थे लेकिन उस वक्त के हालात, और विभाजन के नाम पर हुए तांडव के लिए उन्हे माफ भी नहीं किया जा सकता...ये अलग बात है कि इस विभाजन के लिए वो अकेले ही जिम्मेदार नहीं थे... बल्कि विभाजन के लिए वो लोग भी जिम्मेदार थे जिन्होने इसे होने दिया और इसका विरोध नहीं किया...क्यों कि इसमें उनका भी हित छुपा हुआ था... अगर जिन्ना को सत्ता की भूख थी तो दूसरा पक्ष भी कुर्सी पर आसीन होने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था... लेकिन कहते हैं कि जीतने वाला ही इतिहास लिखता है...इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ आजादी के बाद जो भी इतिहास लिखा गया उस पर कांग्रेस की पकड़ बनी रही... इसलिए अब उस इतिहास के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज को बगावत का दर्जा दे दिया जाता है
सोमवार, अगस्त 17
शाहरूख प्रकरण का सच
शाहरूख ख़ान ने भी इस मामले को खूब तूल दिया और अपने हर बयान में ये बताया कि उन्हे केवल उनके सरनेम ख़ान के कारण पूरी फ़जीहत उठानी पड़ी...ये बयान देने के दौरान वो बार-बार "माइ नेम इज ख़ान" कहना नहीं भूल रहे थे.. जो कि उनकी आने वाली नई फ़िल्म का नाम है... यानि वो इस पूरे मामले को इसलिए भी तूल देना चाह रहे थे ताकि उनकी इस फ़िल्म की मुफ़्त में पब्लिसिटी हो जाए.. मीडिया ने ये अफवाह फैलाई कि शाहरूख ख़ान को न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर दो घंटे के लिए हिरासत में रखकर पूछताछ की गई...जबकि हकीकत इससे बिलकुल जुदा है... दरअसल एयरपोर्ट पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख के साथ उनका सामान नहीं होने के कारण शक के आधार पर दूसरे श्रेणी की सुरक्षा जांच के लिए रोका था... उस दौरान इस जांच के लिए और भी कई लोगों को रोका गया था जिसके कारण शाहरूख की बारी आने में थोड़ा समय लगा...उसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख से सामान्य पूछताछ की..इस पूरी प्रक्रिया में क़रीब 66 मिनट का समय लगा..जो कि बहुत ही सामान्य सी बात है... और बाद में जब सुरक्षाकर्मियों को शाहरूख के रुतबे का पता चला तो उन्होने उन्हे तुरत जाने दिया...
अब सवाल ये उठता है कि इस पूरे मामले में इतनी हायतौबा क्यों मचाई गई... दरअसल शाहरूख को अपनी जांच करवाना इसलिए भी नागवार गुजरा क्यों कि उन्हे भारत में कभी भी इस तरह की स्थिति से दो चार नहीं होना पड़ा था... भारत में ऐसे भी सुरक्षाकर्मियों को इतनी आजादी नहीं दी गई है कि वो सही तरीके से अपना काम कर सकें..उन्हे कदम-कदम पर सिफारिशी लोगों के साथ रियायत बरतनी पड़ती है.. यहां तक की एक छुटभैया नेता के फोन पर ही वो कांप जाते हैं.. और अगर अमेरिका की बात करें तो वहां पर कई लम्हे ऐसे भी आए जब पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर और कैनेडी जैसी हस्तियों को भी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा..जबकि उन्हे सुरक्षा जांच से छूट मिली हुई है..
अब रही बात मीडिया की....कि क्यों उसने इस पूरे मामले पर इतनी हायतौबा मचाई... दरअसल आजकल स्वाइन फ्लू के मामले में वो सनसनी नहीं रही जो उन्हे अच्छी टीआरपी दिला सके... तो बस शाहरूख का मामला आते ही उसे मौका मिल गया और पूरे दिन इस मामले को भुनाते रहे.. और लोगों की भावनाओं से खेलते रहे... कभी इस पूरे मामले को इस्लाम से जोड़ा गया तो कभी देशभक्ति से... कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है राई जैसे इस पूरे मामले को पहाड़ बना कर पेश किया गया... हो सकता है मेरी इस राय से कई लोग सहमत ना हों लेकिन सच तो आख़िर सच है
रविवार, अगस्त 16
हाउस वाइफ को मिलेंगे 6,000 रुपये महीना
इस ख़बर की शुरुआती पंक्तियों को पढ़ते वक्त मैने सोचा कि लगता है हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ये सरकार को ये नया प्रावधान सुझाया है...फिर मुझे लगा कि इस ख़बर से मुझे खुश होना चाहिए की दुखी...क्यों कि मुझे इतना तो यकीन था कि सरकार हाउस वाइफ को 6 हज़ार रुपए महीना तो देने से रही...हां ये जरूर हो सकता है कि सरकार इसी बहाने उनपर इन्कम टैक्स देने का दबाव बना दे..और फिर उनसे मिले राजस्व को नेताओं की मौज मस्ती पर उड़ा दे...खैर मेरी सांस में सांस तब आई जब देखा कि ये मामला महज मुआवजे का है और कोर्ट ने एक अनुमान के आधार पर हाउस वाइफ की ये आमदनी बताई...हां उसने इतना जरूर किया सुप्रीम कोर्ट के 3 हज़ार रुपए प्रति महीने की आमदनी के फ़ैसले को बदलते हुए 6 हज़ार प्रति महीने कर दिया...चलिए कम से कम न्यायपालिका को तो महंगाई का अहसास हुआ
शनिवार, अगस्त 15
सूख जाएगी गंगा
हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकल कर करीब 200 किलोमीटर का सफर तय करके गंगा नदी गोमुख होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। इससे पहले गंगा नदी में 6 नदियों का विलय होता है...अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा से मिलती है...उसके बाद थोड़ा आगे चलकर नंदप्रयाग में नंदाकिनी नदी का विलय होता है...कर्णप्रयाग में पिंडर नदी मिलती है...रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी से मिलन होता है... आखिर में देव प्रयाग में भागिरथी से मिलकर गंगा नदी अपने वास्तविक रूप में आती है और शिवालिक पहाड़ी से होती हुई हरिद्वार में अवतरित होती है।
इसके बाद ये नदी क़रीब 2,510 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस दौरान ये मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरती है। इसमें से हरिद्वार, इलाहाबाद और वाराणसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं से काफी जुड़े हुए हैं। ये गंगा नदी भारत की लगभग आधी आबादी के लिए जीवन दायिनी बनी हुई है। कहीं इसके पानी का इस्तेमाल पीने के लिए हो रहा है तो कहीं इससे निकाली गई नहरों से सिंचाई की जा रही है। और अगर धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो हिन्दुओं ने इसे माता का दर्जा दिया है और वे इसकी पूजा करते हैं। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थों में भी इस नदी का जिक्र मिलता है।
अब वही गंगा मैया इतिहास के पन्नों में सिमटने की तैयारी कर रही है और इसकी वजह है हमलोगों के पाप जो ग्लोबल वार्मिंग बनकर पल पल इसे आखिरी मुकाम की ओर ढ़केल रहे हैं। जी हां वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग को ही गंगा नदी के सूखने की वजह बताई है। उनके मुताबिक गंगा नदी जिस गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है वो तेजी से पिघल रहा है। गंगा नदी का क़रीब 70 फीसदी पानी इस ग्लेशियर से आता है और ये हर साल 50 यार्ड की रफ़्तार से पिघल रहा है। जो कि दस साल पहले किए गए अनु्मान से दोगुना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार इस तरह से जारी रही तो 2030 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएगा और सूखने लगेगी गंगा नदी। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक उस स्थिति में गंगा नदी मौसमी नदी बनकर रह जाएगी...जो केवल बरसात के मौसम में ही नज़र आएगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो जरा सोचिए उस पूरी आबादी का क्या होगा जो इस जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी के सहारे जी रहे हैं साथ ही उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जिनकी आस्था इस नदी से जुड़ी हुई है....इसलिए यही सही वक्त है कि हम सचेत हो जाएं और गंगा नदी को बचाने का संकल्प लें...
आज़ादी के मायने
एयर कंडीशन्ड दफ़्तरों और घरों में बैठकर आजादी का मतलब निकालना काफी आसान होता है...लेकिन आजाद फिज़ा और आजाद वातावरण में आजादी की बात करना आजकल थोड़ा मुश्किल हो गया है..अगर आप घर से बाहर निकल कर आजादी की सांस लेना चाहते हैं तो आप ऐसा नहीं कर सकते क्यों कि खुली हवा में फैक्ट्रियों और गाड़ियो ने ज़हर घोल दी है...क्यों कि विकास की आंधी और शासन-प्रशासन ने उन्हे प्रदूषण फैलाने की आजादी दे दी है...
आजकल लड़कियां जब अपने फैशन की आजादी के साथ घर से बाहर कदम रखती है तो उसे हर तरफ से आजाद ख़्यालात से रूबरू होना पड़ता है क्यों कि खुद को मर्द समझने वाले मनचले अपने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ उन्हे हर नुक्कड़ पर खड़े मिल जाते हैं..क्यों कि इन मनचलों को हमारे समाज और पुलिस ने ऐसा करने की आजादी दे रखी है...यही हाल दूसरे अपराधियों का भी है जो घर में घुसकर और राह चलते लोगों को लूट रहे हैं क्यों कि उन्होने भी पुलिस महकमे को अपनी आजादी की फीस दे रखी है...और तो और आज की तारीख में शासन के कमजोर हाथ के नीचे पुलिस भी आजादी से गुंडागर्दी कर रही है..
अगर आप समझते हैं कि आप आजाद देश के आजाद नागरिक हैं तो ये गलतफ़हमी सरकारी दफ़्तरों में बैठे बाबू लोग दूर कर देंगे..क्यों कि आपको वहीं जाकर पता लगेगा कि आपको अपनी आजादी पाने के लिए कितना शुल्क अदा करना पड़ेगा..आखिर हो भी क्यों नहीं बाबू लोग तो रिश्वत लेने की आजादी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं..अगर उन्हे रोकने की कोशिश की गई तो शायद वो लोग मानवाधिकार आयोग का दरवाजा भी खटखटा दें...
नेताओं की बात करें तो वो तो खुद को आजादी के ठेकेदार ही समझते हैं..उन्हे तो हर बात की आजादी है वो चाहें तो घोटाला करें, वो चाहें तो संसद में सवाल उठाने के लिए पैसे लें, वो चाहें तो सरकार को बचाने के लिए सांसदों की ख़रीद-फरोख़्त करें, वो चाहें तो गुंडागर्दी करें, वो चाहें तो किसी की हत्या कर दें...लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता..क्यों कि शायद उन्हे ऐसा करने की आजादी मिली हुई है...ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं ऐसे आजादी के परवाने हमारे समाज में ना जाने कितने मौजूद हैं..
इतना सब कुछ होने के बावजूद हम आज आज़ाद हैं क्यों कि हमारे अंदर आज़ादी का जज़्बा है..और हमारे ख़्यालात आजाद हैं...बस जरूरत है समाज में मौजूद तथाकथित आज़ादी के दिवानों के पर कतरने की...तभी हमारा मुल्क वाकई आज़ाद होगा...जय हिन्द
शुक्रवार, अगस्त 14
भगवान कृष्ण भगाएंगे स्वाइन फ्लू
अब रुख करते हैं आंध्रप्रदेश की जहां के मुख्यमंत्री डॉक्टर राजशेखर रेड्डी की आस्था झंडू बाम में है...क्यों कि आजकल वो स्वाइन फ्लू को ख़त्म करने के लिए झंडू बाम लगाने की वकालत कर रहे हैं...उनका नारा है "झंडू बाम लगाओ स्वाइन फ्लू दूर भगाओ"..अब ये तो शोध का विषय कि झंडू बाम में ऐसा क्या है जिससे स्वाइन फ्लू को काबू में किया जा सकता है..लेकिन ये बात तो तय है कि अगर आंध्रप्रदेश की जनता ने अपने मुख्यमंत्री की बात मानी तो इस मंदी के माहौल में भी झंडू बाम बनाने वाली कंपनी को जबरदस्त मुनाफा होगा...ये भी हो सकता है झंडू बाम वाले राजशेखर रेड्डी को अपना ब्रांड अंबेस्डर ही बना दें..
चलिए अब आपको मध्यप्रदेश ले कर चलते हैं जहां पर स्वाइन फ्लू की जांच के लिए संदिग्ध मरीजों के सैंपल को दिल्ली और पुणे भेजा जाता है..अब यहां सोचने वाली बात ये है कि स्वाइन फ्लू से प्रभावित दिल्ली और पुणे में पहले ही मरीजों की लंबी कतारें लगी हुई है तो ऐसे में उसे मध्यप्रदेश से आए सैंपल की जांच में तो वक्त लगेगा ही..और ऐसा ही हो भी रहा है..मध्यप्रदेश में सैंपल की जांच रिपोर्ट आने में कम से कम आठ से दस दिन लग रहे हैं...अब इस बात से आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं मध्यप्रदेश स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए कितना तैयार है..और अगर वहां पर स्वाइन फ्लू नहीं फैल रहा है तो शायद ये भी महाकाल की कृपा ही है
गुरुवार, अगस्त 13
घर की मुर्गी दाल बराबर
पिछले दिनों मैं मिठाई की दुकान पर गया...मैने बहुत ही ललचाई आंखों से समोसे की ओर देखा लेकिन उसके भाव में भी दो रुपए का उछाल आ गया था..अब तो ऐसा लग रहा था जैसे समोसा ही मुझे खाने वाली नज़रों से घूर रहा हो...मिठाई की दुकान से अपनी जीभ समेट कर आगे बढ़ा तो मुझे याद आया कि घर में सब्जी नहीं है...मैं सब्जी वाले के पास पहुंचा और सब्जियों के भाव पूछने लगा...सब्जियों के भाव सुनकर लगा कि अगर मैं एक महीने तक सब्जियां खाना बंद कर दूं तो मेरे एक महीने के पेट्रोल का खर्चा निकल आएगा...फिर भी मन मसोस कर कुछ मोलभाव कर कुछ निम्न श्रेणी की सब्जियां खरीद ली...पहले सब्जियों के साथ धनिया पत्ती फ्री में मिलती थी अब तो धनिया पत्ती खरीदने पर कुछ सब्जियां फ्री में मिल रही हैं... दूध का भाव जिस तरह से चढ़ रहा है उससे तो लगता है जैसे इसकी लत शराब की लत से भी ज़्यादा बुरी हो...बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि शराब की लत में लोग अपना घर-बार भी लुटा देते हैं...पर मुझे लगता है अब दूध पीने के लिए ही लोगों को अपना घर-बार लुटाना पड़ेगा.. उस पर से नेताओं का आश्वासन कि जल्दी ही महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा..अरे इन नेताओं का क्या है ये लोग तो बोफोर्स तोप, चारा, कोयला और ना जाने क्या क्या खाकर अपना पेट भर लेते हैं..लेकिन हम आम लोगों को पेट भरने के लिए दाल-रोटी ही खानी पड़ती है..क्यों कि इससे ज़्यादा हमें हज़म भी तो नहीं होती
बुधवार, अगस्त 12
मंत्री के द्वार पहुंचा स्वाइन फ्लू
चीन की दादागिरी
अगर सामरिक शक्ति की बात करें तो हम कई मामलों में चीन से काफी पीछे हैं और इस बात को खुद नेवी के चीफ ने भी माना है...फिर भी हमें सतर्क रहने की जरूरत है..लेकिन हमारा विदेश मंत्रालय अब भी चीन से बेहतर रिश्ते की दुहाई दे रहा है..उसका मानना है कि भारत को बांटने की राय चीन के एक निजी संस्था की है और चीन आधिकारिक तौर पर भारत से अच्छे रिश्ते चाहता है..इस मौके पर मैं विदेश मंत्रालय को 1962 का वाक्या याद दिलाना चाहूंगा जब पंडित नेहरू भी चीन को "पंचशील का सिद्धांत" की दुहाई देते रह गए और उसने भारत पर हमला कर दिया..हमारा देश आज एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है और हम फिर वही गलती दोहराने की भूल कर रहे हैं...हाल ही में भारत ने जिस तरह से पाकिस्तान के चतुर प्रधानमंत्री के सामने जिस तरह से घुटने टेके उससे तो यही जाहिर होता है कि हमारा विदेश मंत्रालय कूटनीतिक मामले में दिवालिया हो गया है...
अगर विदेश मामलों की बात करें तो कुछ दिन पहले इसी विदेश मंत्रालय ने ढ़िढ़ोरा पीटा था कि पाकिस्तान मुंबई हमले में मारे गए चार आतंकवादियों को अपना नागरिक मान रहा है और वो भारत से उनके शव लेना चाहता है...लेकिन विदेश मंत्रालय जिसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहा था उसकी हवा पाकिस्तान ने एक झटके में निकाल दी..वो इस बात से बिलकुल मुकर गया कि उसने मुंबई हमले में मारे गए आतंकवादियों को अपना नागरिक माना था...कहने को तो विदेश मंत्रालय में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार शशि थरूर जैसे नेता बैठे हुए हैं लेकिन क्या उनकी जानकारियों और कूटनीतिक समझ का फायदा भारत को मिल रहा है?...आखिर में घूम फिरकर बात वहीं आ जाती है कि हम गलती पर गलती किए जा रहे हैं फिर भी उन ग़लतियों से सबक लेने की समझ हमारे अंदर नहीं आई..और जब तक ऐसा होता रहेगा हमारे पड़ोसी मुल्क ऐसे ही हमें आंख दिखाते रहेंगे...
सोमवार, अगस्त 10
आज़ादी की घटती कीमत
ऐसा नहीं है कि ये कुछ लोगों की मानसिकता है...मुझे याद आ रहे हैं कॉलेज के वो दिन जब मैं दिल्ली युनिवर्सिटी के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहा था...उन दिनों मैने और मेरे कुछ दोस्तों ने कॉलेज में स्वतंत्रता दिवस को धूमधाम से मनाने का निश्चय किया...हमलोगों ने अपना पॉकेट मनी मिलाया और फिर कॉलेज के दूसरे साथियों से भी चंदा करने के लिए निकल पड़े..हमें उम्मीद थी कि हमारी मेहनत रंग लाएगी...लेकिन सुबह में बनी हमारी ये उम्मीद शाम तक टूटने लगी थी..हालात ऐसे बन गए थे कि कॉलेज के लड़के-लड़कियां हमें देखते ही कन्नी काटने लगे थे...और जो अन्जाने में कन्नी नहीं काट पाते थे वो बमुश्किल अपने पॉकेट से दो-तीन रुपए निकालकर हमारे हाथ पर रख देते थे..ख़ैर किसी तरह से हमने सारी व्यवस्थाएं की और सादे तरीके से स्वतंत्रता दिवस मनाया..इस वाकये को गुजरे कुछ ही दिन हुए थे कि कॉलेज के कुछ लड़कों ने कॉलेज में रेन डांस का आयोजन किया...हमें आश्चर्य तो तब हुआ जब कॉलेज के हमारे साथियों ने इसके लिए बिना कहे पचास-पचास, सौ-सौ के नोट आयोजकों के हवाले कर दिए...उस पल भी मुझे आज़ादी की गिरती कीमत का अंदाजा हुआ....
पिछले साल मैं अपनी गाड़ी की सर्विसिंग करान के लिए एक प्रतिष्ठित सर्विस सेंटर पर गया था...वहां पर मैने देखा कि कई छोटे-छोटे तिरंगे गाड़ियों के आस-पास फेंके हुए थे..जब मैं उन्हे उठाने लगा तो वहां बैठे सर्विस सेंटर के एक कर्मचारी ने कहा..साहब आप बेकार में ही परेशान हो रहे हैं..थोड़ी देर में कचरा वाला आएगा और ये सब उठा कर ले जाएगा..वैसे भी 26 जनवरी को नए झंडे खरीदे जाएंगे..ये पुराने वाले झंडे तो बेकार हो गए हैं। उस पल भी मुझे अहसास हुआ कि अपनी आजादी कितनी सस्ती हो गई है




