बुधवार, सितंबर 30

क्वात्रोकी को क्लीन चिट

सुप्रीम कोर्ट में आखिरकार यूपीए सरकार ने अपनी मंशा साफ कर दी...उसने डंके की चोट पर कह दिया कि क्वात्रोकी का बोफोर्स घोटाला कांड से कोई लेना देना नहीं है... अब तो मेरी समझ में ये नहीं आता है कि जब बोफोर्स घोटाले से किसी का कोई लेना-देना ही नहीं है तो अस्सी के दशक में जो बोफोर्स घोटाला हुआ था उसमें किसी ने लेन-देन किया भी था या नहीं... क्यों कि अब तक जितने आरोपित थे वो सब एक-एक कर बेगुनाह साबित होते जा रहे हैं.. शायद यही वजह है कि यूपीए सरकार के दुबारा सत्ता में आने की खुशी भारत से ज़्यादा इटली के लोगों में थी.. इटली के लोगों को ऐसा लगता है जैसे इंग्लैंड के बाद उन्ही के देश ने भारत को गुलाम बनाया है... यूपीए सरकार और गांधी परिवार के वफादार लोगों की सोच भी शायद यही होगी कि 'सारी खुदाई एक तरफ मैडम जी का भाई एक तरफ' ... क्वात्रोकी पूरे मामले से बरी हो जाएगा ये तो उसी वक्त साफ हो गया था जब भारत के विदेश मंत्री गुपचुप तरीके से क्वात्रोकी और उसके बेटे से मिले थे... दूसरा संकेत तब मिला जब क्वात्रोकी के फ्रीज किए गए विदेशी खाते को थोड़ी देर के लिए डीफ्रीज कर दिया गया और उसी थोड़ी देर में क्वात्रोकी ने अपने सारे पैसे उस खाते से निकाल लिए.. तीसरा संकेत तब मिला जब अर्जेंटीना में क्वात्रोकी की गिरफ़्तारी के बावजूद भारत सरकार उसके ख़िलाफ़ कोई सबूत पेश नहीं कर पाई और उसे क्वात्रोकी के सभी कानूनी खर्चे भी देने पड़े... चौथा संकेत तब मिला जब यूपीए सरकार ने क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ इंटरपोल को जारी किया गया रेड कार्नर नोटिस वापस ले लिया... यूपीए सरकार संकेत पर संकेत दिए जा रही थी फिर भी भारत की नादान जनता क्वात्रोकी को सज़ा मिलने की आस लगाए बैठी थी... आखिरकार कल वो दिन आ गया जब सब लोगों का इंतजार ख़त्म हो गया और यूपीए सरकार ने क्वात्रोकी को दूध का धुला हुआ मान लिया... बड़े बुजुर्ग तो पहले ही कह गए हैं कि 'सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का'

सोमवार, सितंबर 21

अपनी डफली अपना राग

मुंबई हमले के साजिश में सक्रिय भूमिका निभाने वाले हाफ़िज़ सईद को पाकिस्तान में उनके ही घर में नज़रबंद कर दिया गया है...ये ख़बर सुनते ही भारत के राजनेता अपनी क़ाबिलियत का ढ़िंढ़ोरा पीटने लगे... उन्होने ये दावा करना शुरू कर दिया कि उनकी कूटनीति के कारण ही सईद को नज़रबंद किया गया है... पर हक़ीक़त कुछ और है...पिछले कई महीनों से भारत 26 नवंबर को मुंबई पर हुए हमले में कथित भूमिका के लिए जमात उद दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करता रहा है... जमात उद दावा को प्रतिबंधित लश्करे तैबा का नया रुप माना जाता है...26 नवंबर को हुए मुंबई हमले की जल्दी ही बरसी होने वाली है..लेकिन अबतक उसके दोषियों के ख़िलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं जा सकी है...भारत सरकार कसाब को अपने गले की घंटी बनाकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इंसाफ़ के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है... लेकिन उसे इंसाफ़ के नाम पर मिल रही है केवल दिलासाएं... पाकिस्तान ने अमेरिका के दबाव में आकर जिन सात लोगों को गिरफ़्तार किया है उनके ख़िलाफ़ जांच और कार्रवाई केवल कागजों में ही सिमट कर रह गई है.. जब भी पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव पड़ता है वो उस कागज में दो-चार लाईन और जोड़ कर दबाव डालने वालों को संतुष्ट कर देता है...

हाफ़िज़ सईद को नज़रबंद करने का मामला ऐसी ही एक कोशिश है... पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाने के लिए सईद को उनके घर में ही नज़रबंद कर दिया है... लेकिन उसके ख़िलाफ़ जो आरोप लगाए हैं वो बेहद ही बचकाना है... दरअसल इसके पीछे पाकिस्तान का एक स्वार्थ छुपा हुआ है.. पाकिस्तान ने सईद को भड़काऊ भाषण देने के आरोप में नज़रबंद किया है...और पाक चाहता है कि ईद के मौके पर सईद कोई ऐसा भड़काऊ भाषण ना दे दें जिससे मुल्क में दंगा भड़के... लेकिन पाकिस्तान ने इस कार्रवाई को ऐसे पेश किया जैसे वो मुंबई हमला मामले के बारे में काफी गंभीरता से कार्रवाई कर रहा है... पाकिस्तान के इस फरेब को भारत के राजनेताओं ने भी सही मान लिया और जुट गए अपनी कूटनीतिक ज्ञान का बखान करने में... अगर हमारे राजनेताओं में इतना ही कूटनीतिक ज्ञान होता तो 16 जुलाई को शर्म अल शेख में पाकिस्तान के साथ जो साझा बयान जारी हुआ वो नहीं हुआ होता.. ख़ैर राजनेताओं का क्या.. वो तो अपनी डफली अपना राग के लिए मशहूर तो हैं ही... कम से हम जैसे आम लोग उनके बहकावे में ना आएं... यही हमारी सेहत के लिए ठीक रहेगा

गुरुवार, सितंबर 17

हंगामा है क्यों बरपा ?

राहुल बाबा के ट्रेन पर पथराव क्या हुआ... इसके आरोपियों को पकड़ने के लिए विशेष दस्ते की नियुक्ति कर दी गई...ट्रेन के गार्ड ने भी अपनी सतर्कता दिखाते हुए बताया कि उसने चार युवकों को ट्रेन पर पत्थर फेंकते हुए देखा था.. साथ ही उसने ये भी बताया कि उसने पत्थर फेंक रहे युवकों को मना भी किया था...शताब्दी ट्रेन के इस गार्ड महाशय की चौकसी देखकर ऐसा लगता है जैसे भारतीय रेलवे सुधर गया है.. लेकिन याद कीजिए कुछ दिन पुरानी बात जब बिहार में एक ट्रेन में घुसकर कुछ लोगों ने एक पूरी बोगी के यात्रियों को लूट लिया था... और अगर इससे कुछ दिन और पहले की बात करें तो एक पूरी ट्रेन को कुछ लोगों ने रोककर आग के हवाले कर दिया था...ऐसी घटनाओं को याद करने बैठा जाए तो एक के बाद एक ना जाने कितनी घटनाएं स्मृति पटल पर दस्तक देती चली जाएगी...

लेकिन इन मामलों में ना तो गार्ड चौकस था और ना ही रेलवे सुरक्षा बल.. पर जब बात राहुल बाबा की हो तो पूरी चौकसी तो बरतनी ही पड़ती है.. क्यों कि राहुल बाबा भले ही दलितों के घर में खाते हों... और शताब्दी में बैठकर आम लोगों के साथ रेल यात्रा करते हों.. पर ऐसा करने से कोई आम आदमी तो हो नहीं जाता... प्रशासन के बाबुओं को भी ये पता है.. शायद यही वजह है कि वो राहुल बाबा को आम आदमी समझने की भूल नहीं करना चाहते हैं.. और वो पथराव जैसी छोटी बात को भी तूल देने में लगे हुए हैं... रही बात कांग्रेस के किफायत अभियान की तो... शायद कांग्रेसी ये भूल जाते हैं कि जब वो इकॉनॉमी क्लास में या फिर रेल से यात्रा करते हैं तो उनके आसपास की सीट उनके सुरक्षाकर्मियों के लिए रिजर्व की जाती है... और अगर इस पूरे खर्चे को जोड़ा जाए तो वो बिजनेस क्लास से कहीं ज़्यादा महंगा साबित होता है... और आम आदमियों को इससे परेशानी होती है वो अलग... ऐसे में अगर राहुल बाबा और सोनिया जी आम आदमियों के बारे में सोचना चाहती हैं तो उन्हे आम आदमियों के दिल के बजाए पेट का ख्याल करना चाहिए... क्यों कि अगर वो बिजनेस क्लास में ही बैठकर लोककल्याण के बारे में बेहतर योजनाएं तैयार कर पाएं तो इससे आम आदमियों का भला होगा.. बजाए इसके कि आम आदमियों के साथ सफर करके पूरा ध्यान उनकी सहानुभूति बटोरने में लगा रहे

मंगलवार, सितंबर 8

मंत्रियों की ऐय्याशी

खुद को आम आदमियों की सरकार बताने वाली यूपीए सरकार ने पिछलने दिनों सूखे से निपटने के लिए अनोखा ऐलान किया था.. उन्होने सूखाग्रस्त इलाकों में वित्तीय सहायता पहुंचाने के लिए अपने मंत्रियों की तनख्वाह से बीस फीसदी की कटौती करने का ऐलान किया था.. यूपीए सरकार की इस घोषणा ने उसे लोगों के बीच और मशहूर बना दिया..आम लोगों को लगने लगा कि वाकई यूपीए सरकार आम लोगों की ही सरकार है.. लेकिन हकीकत इससे बिलकुल जुदा है... यूपीए सरकार ने अपने जिन मंत्रियों की तनख्वाह में से बीस फीसदी की कटौती का ऐलान किया था उसी में से एक हैं विदेश मंत्री एस एम कृष्णा जिन्होने पिछले तीन महीने से मौर्या शेरेटन के प्रेसिडेंसियल सूट में डेरा डाला हुआ था...ये वही प्रेसिडेंसियल सूट है जहां पर कभी अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और रूस के राष्ट्रपति पुतिन रह चुके हैं...इस सुइट के बेडरूम से लेकर बाथरूम तक आलीशान हैं। हर कोने से राजमहल की रौनक नजर आती है...जाहिर है कि कृष्णा इस शानदार सुइट को क्यों छोड़ना चाहेंगे। उन्होने तो 1 त्यागराज मार्ग का सरकारी, बंगला पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह वाला बंगला और तुगलक रोड वाले बंगले की पेशकश को ठुकरा दिया था। उनका मानना है कि ये बंगले उनके रहने लायक नहीं है..पर शायद उन्हे इस बात का अंदाजा नहीं है कि जिस जगह वो टिके हुए हैं उस जगह का एक दिन का भाड़ा एक लाख रुपये है..अगर पिछले तीन महीने का भाड़ा जोड़ा जाए तो ये 90 लाख रुपया बनता है.. अगर इस राशि को सूखाग्रस्त इलाके के किसानों के बीच बांट दिया जाता तो कम से कम एक सौ किसानों को राहत पहुंचाई जा सकती थी...

यूपीए सरकार के मंत्रियों की शानो शौकत यहीं ख़त्म नहीं होती इस फेरहिस्त में विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर का नाम भी है..जो ताज पैलेस के वीआईपी सुइट में ठहरे थे..इनसे भी केरल हाउस में ठहरने की गुजारिश की गई थी... लेकिन उन्होने इस गुजारिश को ठुकरा कर तीन महीने से प्रति दिन 40 हज़ार रुपये बतौर किराया देना ज्यादा मुनासिब समझा.. भला हो वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का जिन्होने सरकारी ख़जाना ख़त्म होता हुआ देख.. इन मंत्रियों को होटल छोड़ देने की मिन्नत करना शुरू कर दिया.. उनकी मिन्नते रंग लाई और आज आखिरकार इन मंत्रियों ने होटल छोड़ दिया...अब तो आप समझ ही सकते हैं कि जिस सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों का ये हाल है... वो सरकार देश के वित्तीय हालात को लेकर कितनी संजीदा हो सकती है

शुक्रवार, सितंबर 4

टीआरपी के लिए @#&*$ कुछ भी करेगा

बुधवार का दिन...सुबह के क़रीब 11 बज रहे थे..सभी न्यूज़ चैनलों पर लगातार ब्रेकिंग न्यूज़ आ रहा था.. आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी लापता...उनके हेलिकॉप्टर से संपर्क टूटा । शाम होते-होते ये ख़बर सबसे बड़ी ख़बर बन चुकी थी... लगभग सभी न्यूज़ चैनलों पर विशेषज्ञों ने मोर्चा थाम लिया था.. जितने चैनल उतने कयास... देश भर में असमंजस की स्थिति बनी हुई थी.. न्यूज़ चैनल्स भी इस मौके का ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठा लेना चाहते थे.. क्यों की बहुत दिनों से उनकी दुकान पर ऐसी मसालेदार कोई चीज नहीं आई थी... लगभग चैनलों में एक जैसे हालात थे.. शायद चैनल के वरिष्ठ लोग अपनी याददाश्त पर जोर डालकर अपने ऐसे किसी मित्र की तलाश कर रहे होंगे जो हैदराबाद में अपनी रोजी-रोटी चला रहा हो... बड़े चैनलों के तो अपने संपर्क सूत्र होते हैं.. लेकिन कुकरमुत्तों की तरह उग आए छोटे-छोटे न्यूज़ चैनलों के वरिष्ठों ने तो हैदराबाद में रह रहे अपने उन मित्रों को भी पत्रकार बना डाला जो वहां राशन की दुकान चला रहे थे...

खैर शाम तक ज़्यादा से ज़्यादा टीआरपी बटोरने का खेल चलता रहा... हर चैनल कुछ हटकर यानि एक्सकुलुसिव चलाने की फिराक में लगा हुआ था... लेकिन दोपहर से लेकर देर शाम तक घटनाक्रम में बहुत तब्दीली नहीं आई थी... ऐसे में दर्शक भी न्यूज़ चैनल से हटने लगे थे क्यों उन्हे भी हर पल कुछ नया और कुछ ताज़ा देखने की आदत है... इसकी भनक शायद टीआरपी रेटिंग में दूसरे स्थान पर काबिज एक बड़े न्यूज़ चैनल को लग चुकी थी... उसने फिर एक तुरूप का पत्ता खेला और रात साढ़े नौ बजे उसने ऐसा ब्रेकिंग देना शुरू किया जो किसी भी चैनल के पास नहीं था... इस न्यूज़ चैनल के एंकर ने दावे के साथ कहना शुरू किया की आंध्रप्रदेश के सीएम राजशेखर रेड्डी बिलकुल सुरक्षित हैं... स्थानीय आदिवासियों ने उन्हे देखा है.. इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होने यहां तक दावा कर दिया कि मुख्यमंत्री साहब की वन विभाग के कर्मचारियों से बातचीत भी हुई है... और उन्होने कहा है कि वो पूरी तरह सुरक्षित हैं और लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।

पहले तो लोगों को इस ख़बर पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन लोगों को विश्वास दिलाने के लिए वो न्यूज़ चैनल अपने संपादक महोदय को भी लोगों के आगे कर दिया... संपादक महोदय ने भी दर्शकों की आंख में आंख डालकर दावे के साथ कहा कि रेड्डी साहब पूरी तरह सुरक्षित हैं... दर्शकों ने मजबूरन उनकी बातों पर विश्वास करना शुरू कर दिया... अब बारी कुछ दूसरे न्यूज चैनलों की थी.. उन्होने भी अपनी टीआरपी खिसकते देख उसे बड़े न्यूज चैनल का अनुसरण करना शुरू कर दिया... हालांकि इस दौड़ में कुछ न्यूज़ चैनल शामिल नहीं हुए और उन्होने अपनी जिम्मेदारी समझी... दूसरे दिन सुबह होते होते धटनाक्रम पर छाया धुंध साफ होने लगा... बचाव दल के लोगों को हेलिकॉप्टर का मलबा मिल गया था... और थोड़ी देर में उन्हे मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी समेत हेलिकॉप्टर में सवार सभी पांच लोगों के शव भी मिल गए.. इस ख़बर को भी उस तथाकथित बड़े चैनल ने जोर-शोर से चलाया और अपनी शाम वाली गलती को छिपाने के लिए कई ड्रामे भी किए... हो सकता है कि इस बार की टीआरपी रेटिंग में अपने उस आधे घंटे की टीआरपी की बदौलत वो सर्वोच्च स्थान भी हासिल कर ले... और शायद उसे इस बात का एहसास भी कभी ना हो कि उसने उस आधे घंटे में कितनी संवेदनाओं, कितने भावनाओं और पत्रकारिता के ना जाने कितने उसूलों का क़त्ल कर दिया है

गुरुवार, अगस्त 27

सच की क़ीमत

अगर आपको लगता है कि आपकी बीवी, गर्लफ्रेन्ड, पति या फिर ब्वॉय फ्रेंड आपको धोखा दे रहा/रही है.. तो अब आप अपनी इस शंका का समाधान कर सकते हैं.. और वो भी सिर्फ पांच हज़ार में.. यानि अब कोई भी शख्स सिर्फ पांच हजार रुपए खर्च करके सच का सामना कर सकता है..बशर्ते उसमें उस कड़वे सच को सहने की क्षमता हो। अगर आपको लगता है कि मैं लंबी-लंबी फेंक रहा हूं तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि..विकसित देशों की तर्ज पर अब हमारे देश में भी एक ऐसा प्राईवेट फॉरेंसिक लैब खुल गया है जो हर सच पर से पर्दा उठा सकता है..ऐसा नहीं है कि पहले हमारे यहां ऐसे लैब नहीं थे...लेकिन वो सभी सरकारी लैब थे और उसका इस्तेमाल निजी कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता था... अब दिल्ली में खुले इस निजी लैब ने हर आम और ख़ास तबके को सच जानने का मौका दे दिया है...मजे की बात ये है कि इस लैब के खुलते ही इसे दस केस भी मिल गए..

अब वो दिन दूर नहीं जब पति-पत्नी के बीच का झगड़ा इस लैब तक पहुंच जाएगा... लड़के-लड़कियां अपने पॉकेट मनी का इस्तेमाल भी अपनी गर्ल फ्रेंड या ब्वॉय फ्रेंड के चेहरे से नकाब हटाने के लिए करेंगे...बच्चे का असली बाप या मां कौन है इसका फ़ैसला भी लैब ही करेगा। अब कोई भी शख़्स ज़मीन या फ्लैट ख़रीदने से पहले बेचने वाले को इसी लैब में लेकर आएगा ताकि वो फर्जीवाड़े से बच सके...हर जनता चाहेगी कि उसके नेता चुनाव लड़ने से पहले इस लैब में जाकर उनके सवालों का जवाब दें..हर ठेकेदार को इस लैब में बैठाकर उसकी कारगुजारी के बारे में पूछा जाएगा...ये ऐसे तमाम पहलू हैं जो कि इस लैब को बेहतर समाज के लिए जरूरी बनाते हैं..लेकिन क्या ये सिलसिला वाकई यहीं पर आकर रुक जाएगा...? शायद नहीं क्यों कि सच हमेशा कुछ बेहतर ही करे ऐसा जरूरी नहीं है... कई बार कई झूठ कई परिवारों और लोगों के संबंधों में मिठास घोलकर रखता है.. और अगर इस झूठ को उनके दरम्यान से निकाल दिया जाए तो उनके संबंधों में जो कड़वाहट आएगी उसका जिम्मेदार भी यही लैब होगा

बुधवार, अगस्त 26

एक मुलाक़ात गणपति बप्पा से


कल रात मेरे पास गन्नू भाई मुंह पर स्वाइन फ्लू का मास्क लगाकर आए..अरे आप कन्फ्यूज मत होईए..गन्नू भाई से मेरा आशय गणपति बप्पा से है.. तो चलिए मुलाक़ात की बात को आगे बढ़ाते हैं.. गन्नू भाई काफी थके हुए पसीने से तर-बतर थे.. उन्होने अपनी पीठ पर काफी बड़ा सा बैग टांगा हुआ था.. लेकिन एक बात जो मुझे काफी अजीब लगी, वो था उनका 8 पैक एब्स..उसे देखकर मैं काफी हैरान था क्यों कि मेरे मन में जो उनकी छवि थी उसमें उनकी अच्छी खासी तोंद निकली हुई थी...मुझे चौंकते हुए देखकर उन्होने अपनी पीठ पर से अपना भारी बैग उतारा और धम्म से सोफे पर पसर गए... मैने उन्हे पानी पिलाया और खाने के लिए थाली भरकर लड्डू परोस दिया... पानी तो उन्होने पी लिया लेकिन लड्डू खाने से मना कर दिया..बाद में उन्होने बताया कि आजकल वो डायटिंग कर रहे हैं...

मुझे लगा कि मेरे स्वागत सत्कार से वो प्रसन्न हो गए होंगे और अब वो अपने भारी बैग से निकालकर मुझे कुछ तोहफे देंगे... ऐसा ख़्याल आते ही मैं हसरत भरी नज़रों से उनके बैग की ओर एकटक देखने लगा... गन्नू भाई तो अंतर्यामी हैं उन्होने मेरे भाव को ताड़ लिया और अपना बैग खोलने लगे... जैसे-जैसे उनके बैग की गांठ खुलती जा रही थी वैसे-वैसे मेरे दिल की धड़कने तेज होती जा रही थी.. मन ही मन मैने दिल्ली के पॉश इलाके में पांच सौ गज का प्लॉट खरीद लिया था..और जबतक उनके बैग की आखिरी गांठ खुलती तबतक मैने उस प्लॉट पर एक आलीशान बंगला और उस बंगले के गैरेज में दो-तीन लंबी गाड़ियां पार्क कर चुका था..

आख़िरकार इंतजार की घड़ियां ख़त्म हुई.. गन्नू भाई ने उस बैग से सामान निकालना शुरू किया... उन सामानों को देखकर मेरे अरमानों पर एक साथ ना जाने कितना लीटर पानी फिर गया था... उस पानी में मेरा पांच सौ गज का प्लॉट, आलीशान बंगला और लंबी गाड़ियां एक झटके में बह गए.. ऐसा लग रहा था जैसे मैं बिहार के सुपौल ज़िले में खड़ा हूं और एक बार फिर कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल कर सबकुछ अपने में समेट लिया हो... अचानक गन्नू भाई की थकी हुई आवाज से मैं अपने ख़्यालों से वापस आया...मेरे सामने गन्नू भाई अपने बैग से निकाले गए, एके-47, बैट, टीम इंडिया की जर्सी, फुटबॉल जैसे अनगिनत सामानों के साथ खड़े थे.. मैने जब उनसे उन सामानों के बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि ये सब सामान उनके अति उत्साहित भक्तों ने दिया है...उन्होने बताया कि कैसे गणेश उत्सव के दौरान कुछ नया करने की होड़ में उनके भक्तगण उनको कलयुगी बनाने पर तुले हुए हैं..

हद तो तब हो गई जब उनके कुछ भक्तों ने उन्हे मूषकराज से उठा कर डायनासोर पर बैठा दिया... मैने भी थोड़े मजाकिया अंदाज में गन्नू भाई से पूछ ही लिया कि उन्हे डायनासोर पर बैठने में परेशानी क्यों हो रही है..क्यों कि उनका डिल-डौल तो डायनासोर पर बैठने के लिए बिलकुल फिट है..मुझे लगा कि शायद गन्नू भाई डायनसोर की उबड़-खाबड़ पीठ से परेशान हो रहे होंगे..लेकिन ऐसा नहीं था उनकी शिकायत थी पृथ्वीलोक पर हो रही पार्किंग की समस्या से..उन्होने बताया कि डायनासोर के मुक़ाबले चूहे को पार्क करना काफी आसान है.. और चूहे पर सवारी करना सस्ता भी है। इस बारे में वो आगे कुछ बताते इससे पहले ही मैने उनसे मेरे घर पधारने की वजह पूछ ली...लेकिन इस सवाल पर गन्नू भाई की प्रतिक्रिया को देखकर लगा जैसे वो इसी सवाल का इंतजार कर रहे थे..उन्होने सवाल ख़त्म होते ही बताया कि कैसे इंसानों की नित नई जिम्मेदारी संभालते-संभालते वो परेशान हो गए हैं...जब भी कोई नई मुसीबत आती है तो इंसान गणेश उत्सव में मुंह लटकाए हुए उनके पास पहुंच जाते हैं और फिर उन्हे कभी, बैट पकड़ा देते हैं तो कभी आतंकवादियों से लड़ने के लिए एके-47 थमा देते हैं..और तो और उन्हे ऐसे मॉडर्न पोशाक पहना देते हैं कि स्वर्ग लोक में जहां देखो वहीं देवतागण उनकी खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं..

गन्नू भाई ने ये भी बताया कि उन्हे गणेश उत्सव के दौरान क्यों डायटिंग करनी पड़ रही है.. उन्होने बताया कि कैसे मूर्तिकार उनके ऊपर प्लास्टर ऑफ पेरिस थोप कर उनको और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं...और इसी पीओपी के कारण वो पूरे दस दिन कुछ नहीं खा पाते हैं...गन्नू भाई चाहते थे कि मैं मीडिया के माध्यम से इस मामले में जागरुकता फैलाऊं ताकि उनके भक्तजन अपनी समस्याओं का ठीकरा उनपर फोड़ने के बजाए अपने स्तर पर भी उनसे निपटने की कोशिश करें...वैसे भगवान तो अंतर्यामी हैं ही उन्हे कुछ बताने की जरूरत भी नहीं.. वो तो बिना बताए ही अपने भक्तों का कष्ट हर लेते हैं...फिर उनके प्रतिमा से खिलवाड़ करना आस्था के साथ खिलवाड़ करने जैसा ही है..मैं गन्नू भाई से कुछ और सवाल पूछ पाता उससे पहले ही बारिश शुरू हो गई..जबतक मैं कुछ समझ पाता..मेरी आंख खुल गई और सामने हाथ में पानी का गिलास लिए हुए मेरी भतीजी खड़ी थी... तब जाकर मुझे लगा कि गणपति बप्पा से मेरी मुलाक़ात महज एक सपना था

मंगलवार, अगस्त 25

संघ की पैंतरेबाजी

जिन्ना साहब वाकई धर्मनिरपेक्ष थे और वो राष्ट्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे...और अगर सवाल भारत-पाक विभाजन का है तो उसके लिए महात्मा गांधी जिम्मेदार थे..अगर वो चाहते तो इस विभाजन को रोक सकते थे.. ये मैं नहीं बल्कि आरएसएस के पूर्व अध्यक्ष के.सी.सुदर्शन कह रहे हैं। वो जिन्ना पर जसवंत सिंह, सुधीर कुलकर्णी और अरुण शौरी की राय से सहमत हैं... अगर ऐसा है तो वो जिन्ना पर दिए गए आडवाणी की राय से भी सहतम होंगे... फिर भी उनके संघ के अध्यक्ष रहते हुए इस मामले पर खूब हंगामा हुआ.. आडवाणी जी को अपने बयान पर संघ को सफाई देनी पड़ी.. तो क्या ऐसा मान लिया जाए कि संघ में कई विचारधाराओं को मानने वाले लोग हैं फिर हिन्दुत्व का मुखौटा पहनना उनकी मजबूरी बन गई है...

शायद संघ को ये लगता होगा कि देश के बहुसंख्यकों के साथ चलने में ही उनका हित है क्यों कि वही उनकी ताकत हैं... हो सकता है कि उनकी ये सोच सही भी हो क्यों कि अल्पसंख्यकों का कोई भी संगठन उतना सफल नहीं हो पाया है जितना संघ परिवार... लेकिन संघ परिवार ये भी समझ रहा है कि अगर उसे सत्ता के केन्द्र में मौजूद रहना है तो उसके लिए उसे अल्पसंख्यकों को भी झांसा देना होगा..यही वजह है कि वो कभी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बनाते हैं तो कभी उनके लिए शिविर का आयोजन करते हैं...और हो सकता है उनकी इसी मुहिम की अगली कड़ी जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त बताना हो... अब बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी संघ के इस पैंतरे को जानने लगे हैं.. उन्हे लगने लगा है कि अगले साढ़े चार साल तक तो उन्हे सत्ता का तो सुख मिलने से रहा, तो क्यों ना इस बीच ही राजनाथ, आडवाणी, वेंकैया नायडू, और अरूण जेटली जैसे बरगद के पेड़ के साए से निकला जाए...और अपनी अलग छवि बनाई जाए... ऐसा करने पर हो सकता है संघ के दूसरे धड़े का उन्हे समर्थन मिल जाए... लेकिन उन्हे इससे भी सावधान हो जाना चाहिए कि कहीं इस खेल में उनका और उनकी पार्टी का हाल भस्मासुर जैसा ना हो जाए..

गुरुवार, अगस्त 20

राजीव टाइम्स

आज सुबह मैने रोज की तरह बड़े चाव से अख़बार उठाया..और ख़बरें तलाशने लगा...लेकिन पहला पन्ना पलटते ही मुझे पता चल गया कि आज का दिन ऐतिहासिक है..क्यों कि आज के ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी का जन्म हुआ था...मैने अखबार के दो चार और पन्ने पलटे, उम्मीद थी कि कोई अच्छी ख़बर मिल जाएगी...पर..पन्ना दर पन्ना अखबार राजीव गांधी की तस्वीरों और उन्हे महान साबित करने की कोशिशों से भरी पड़ी थी...मुझे याद नहीं आता कि आधुनिक महापुरूषों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह से लेकर इंदिरा गांधी और शंकर दयाल शर्मा तक किसी के जन्म दिवस के मौके पर इतने बड़े पैमाने पर अखबारों में सरकारी विज्ञापन निकाले गए होंगे... आज के अखबार में तो हर मंत्रालय राजीव गांधी के महिमा मंडन में एक दूसरे को पीछे छोड़ता नज़र आया...

आखिर हो भी क्यों नहीं आज सत्ता के केन्द्र में सोनिया गांधी और राहुल गांधी का एक छत्र दबदबा है ऐसे में अगर उनका आर्शिवाद और शुभकामना चाहिए तो राजीव गांधी को तवज्जो तो देना ही पड़ेगा.. मैं ऐसा कहकर राजीव गांधी के कद को छोटा नहीं करना चाहता लेकिन क्या इस तरह से सरकारी पैसों को विज्ञापन के लिए उड़ाना सही है...या फिर विभिन्न मंत्रालय जिस तरह से अपनी योजनाओं का शुभारम्भ आज की तारीख से करने का ऐलान कर रहे हैं क्या वो इसी तारीख का इंतजार कर रहे थे... अगर ऐसा है तो क्या ये भी जनता के साथ धोखा नहीं है... खैर इसके पीछे की सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो सच है कि किसी जमाने में दूरदर्शन पर राजीव गांधी के छाए रहने के कारण उसे राजीव दर्शन का नाम दे दिया गया था... ऐसा ही कुछ आज के अख़बार को भी नाम दिया जा सकता है.. आपके जेहन में कोई नाम आ रहा हो तो मुझे जरूर सुझाईएगा

बुधवार, अगस्त 19

जिन्ना का जिन्न

जिन्ना जब तक ज़िंदा रहे तब तक राजनीतिक विवादों को जन्म देते रहे...वो चाहे भारत-पाक विभाजन हो या फिर विभाजन के बाद उनका पश्चाताप...अब जबकि उनकी मौत को कई दशक बीत चुके हैं तो एक बार फिर जिन्ना ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है... इस बार इस विवाद की नैया को बीजेपी के जसवंत सिंह खे रहे हैं...इससे पहले जिन्ना के जिन्न ने आडवाणी को काफी परेशान किया था...हालात ऐसे हो गए थे कि आडवाणी को बीजेपी में ही दरकिनार कर दिया गया था... लेकिन जसवंत सिंह ने जब अपनी किताब में जिन्ना को महापुरूष का दर्जा दे दिया तो ऐसा लगा कि उन्होने आडवाणी प्रकरण से कुछ नहीं सीखा...बस उनके हित में ये है कि वो बीजेपी में किसी पद पर आसीन नहीं हैं, नहीं तो उनसे भी इस्तीफ़ा मांग लिया जाता...जसवंत सिंह ने अपनी किताब में भारत-पाक विभाजन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल को जिम्मेदार ठहराया है...इसके अलावा उन्होने कई मामलों में कांग्रेस की खिंचाई भी कर दी है..उनके इस बयान से कांग्रेस का चिढ़ना तो लाजिमी ही था..लेकिन उनकी पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी ये बयान दे दिया कि जसवंत की किताब में लिखी बातों से वो सहमत नहीं है और किताब में जिन्ना का महिमामंडन करना गलत है। राजनाथ ने ये भी कहा कि किताब में जो बात सरदार पटेल के लिए लिखी गई हैं वो भी बिलकुल सही नहीं है और पार्टी उनके इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखती।

जिन्ना को लेकर जसवंत सिंह की वकालत बाल ठाकरे को भी नागवार गुजरी है...। जसवंत की किताब में जिन्ना के महिमा मंडल करने पर बाल ठाकरे ने अपनी नाराजगी जताई है....सामना में लिखे लेख में ठाकरे ने कहा कि लाखों निरपराध लोगों का खून बहाने वाला जिन्ना इतिहास पुरूष कैसे हो सकता है.....। ठाकरे ने अपने लेख में जिन्ना को दहशतगर्दी का निर्माता करार देते हुए...जसवंत पर हमला बोला...ठाकरे ने अपने लेख में लिखा है कि कैसे कोई व्यक्ति जिन्ना की तारीफ कर सकता है...ठाकरे ने ये भी साफ किया कि जसवंत की किताब की कीमत बीजेपी को चुकानी होगी..किताब में जसवंत के मुसालमानों को देश में होने वाली परेशानी का जिक्र करना भी ठाकरे को नागावार गुजरा है...ठाकरे ने लेख में लिखा है कि जिस देश के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपि ,चीफ जस्टिस और यहां तक की सुपर स्टार मुसलमान हो सकता है उस देश में मुसलमानों को कैसी समस्या...

मैं भी ये मानता हूं कि जिन्ना साहब एक नेकदिल इंसान थे लेकिन उस वक्त के हालात, और विभाजन के नाम पर हुए तांडव के लिए उन्हे माफ भी नहीं किया जा सकता...ये अलग बात है कि इस विभाजन के लिए वो अकेले ही जिम्मेदार नहीं थे... बल्कि विभाजन के लिए वो लोग भी जिम्मेदार थे जिन्होने इसे होने दिया और इसका विरोध नहीं किया...क्यों कि इसमें उनका भी हित छुपा हुआ था... अगर जिन्ना को सत्ता की भूख थी तो दूसरा पक्ष भी कुर्सी पर आसीन होने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था... लेकिन कहते हैं कि जीतने वाला ही इतिहास लिखता है...इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ आजादी के बाद जो भी इतिहास लिखा गया उस पर कांग्रेस की पकड़ बनी रही... इसलिए अब उस इतिहास के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज को बगावत का दर्जा दे दिया जाता है

सोमवार, अगस्त 17

शाहरूख प्रकरण का सच

शाहरूख ख़ान मामले पर क्यों इतनी हाय तौबा मचाई गई..ये मुझ समझ में नहीं आ रहा है.. आज मैं आपको इस पूरे प्रकरण की हकीकत से रूबरू करवाता हूं...जिस दिन पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 62वीं वर्षगांठ मना रहा था उस दिन पूरे मीडिया पर शाहरूख ख़ान छाए हुए थे...फ़िल्म जगत का ये सितारा एक ही पल में देश और इस्लाम का प्रतीक बन गया था...मीडिया ने तो इस पूरे मामले को देश के अपमान से जोड़ दिया था...आनन-फानन में बड़ी-बड़ी हस्तियों ने भी बयान देकर इस पूरे मामले को तूल दे दिया...जबकि वाक्या महज सुरक्षा जांच का था..जो कभी भी किसी के भी साथ हो सकता है...

शाहरूख ख़ान ने भी इस मामले को खूब तूल दिया और अपने हर बयान में ये बताया कि उन्हे केवल उनके सरनेम ख़ान के कारण पूरी फ़जीहत उठानी पड़ी...ये बयान देने के दौरान वो बार-बार "माइ नेम इज ख़ान" कहना नहीं भूल रहे थे.. जो कि उनकी आने वाली नई फ़िल्म का नाम है... यानि वो इस पूरे मामले को इसलिए भी तूल देना चाह रहे थे ताकि उनकी इस फ़िल्म की मुफ़्त में पब्लिसिटी हो जाए.. मीडिया ने ये अफवाह फैलाई कि शाहरूख ख़ान को न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर दो घंटे के लिए हिरासत में रखकर पूछताछ की गई...जबकि हकीकत इससे बिलकुल जुदा है... दरअसल एयरपोर्ट पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख के साथ उनका सामान नहीं होने के कारण शक के आधार पर दूसरे श्रेणी की सुरक्षा जांच के लिए रोका था... उस दौरान इस जांच के लिए और भी कई लोगों को रोका गया था जिसके कारण शाहरूख की बारी आने में थोड़ा समय लगा...उसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने शाहरूख से सामान्य पूछताछ की..इस पूरी प्रक्रिया में क़रीब 66 मिनट का समय लगा..जो कि बहुत ही सामान्य सी बात है... और बाद में जब सुरक्षाकर्मियों को शाहरूख के रुतबे का पता चला तो उन्होने उन्हे तुरत जाने दिया...

अब सवाल ये उठता है कि इस पूरे मामले में इतनी हायतौबा क्यों मचाई गई... दरअसल शाहरूख को अपनी जांच करवाना इसलिए भी नागवार गुजरा क्यों कि उन्हे भारत में कभी भी इस तरह की स्थिति से दो चार नहीं होना पड़ा था... भारत में ऐसे भी सुरक्षाकर्मियों को इतनी आजादी नहीं दी गई है कि वो सही तरीके से अपना काम कर सकें..उन्हे कदम-कदम पर सिफारिशी लोगों के साथ रियायत बरतनी पड़ती है.. यहां तक की एक छुटभैया नेता के फोन पर ही वो कांप जाते हैं.. और अगर अमेरिका की बात करें तो वहां पर कई लम्हे ऐसे भी आए जब पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर और कैनेडी जैसी हस्तियों को भी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा..जबकि उन्हे सुरक्षा जांच से छूट मिली हुई है..

अब रही बात मीडिया की....कि क्यों उसने इस पूरे मामले पर इतनी हायतौबा मचाई... दरअसल आजकल स्वाइन फ्लू के मामले में वो सनसनी नहीं रही जो उन्हे अच्छी टीआरपी दिला सके... तो बस शाहरूख का मामला आते ही उसे मौका मिल गया और पूरे दिन इस मामले को भुनाते रहे.. और लोगों की भावनाओं से खेलते रहे... कभी इस पूरे मामले को इस्लाम से जोड़ा गया तो कभी देशभक्ति से... कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है राई जैसे इस पूरे मामले को पहाड़ बना कर पेश किया गया... हो सकता है मेरी इस राय से कई लोग सहमत ना हों लेकिन सच तो आख़िर सच है

रविवार, अगस्त 16

हाउस वाइफ को मिलेंगे 6,000 रुपये महीना

हाउस वाइफ की आमदनी 6 हज़ार रुपए प्रति महीना कर दी गई है...ये फ़ैसला तीस हजारी कोर्ट ने किया है...इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के 'लता वाधवा बनाम स्टेट ऑफ बिहार' मामले के फ़ैसले को आधार बनाया है...इसके लिए महिला की उम्र सीम 34-59 साल रखी गई है.. तीस हज़ारी कोर्ट ने ये फ़ैसला 1989 में एक सड़क दुर्घटना में मारी गई एक महिला को मुआवज़ा देने के लिए सुनाया...कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनी को 6 हज़ार रुपए प्रति माह के हिसाब से मृतक के परिजनों को क़रीब साढ़े 7 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है....

इस ख़बर की शुरुआती पंक्तियों को पढ़ते वक्त मैने सोचा कि लगता है हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ये सरकार को ये नया प्रावधान सुझाया है...फिर मुझे लगा कि इस ख़बर से मुझे खुश होना चाहिए की दुखी...क्यों कि मुझे इतना तो यकीन था कि सरकार हाउस वाइफ को 6 हज़ार रुपए महीना तो देने से रही...हां ये जरूर हो सकता है कि सरकार इसी बहाने उनपर इन्कम टैक्स देने का दबाव बना दे..और फिर उनसे मिले राजस्व को नेताओं की मौज मस्ती पर उड़ा दे...खैर मेरी सांस में सांस तब आई जब देखा कि ये मामला महज मुआवजे का है और कोर्ट ने एक अनुमान के आधार पर हाउस वाइफ की ये आमदनी बताई...हां उसने इतना जरूर किया सुप्रीम कोर्ट के 3 हज़ार रुपए प्रति महीने की आमदनी के फ़ैसले को बदलते हुए 6 हज़ार प्रति महीने कर दिया...चलिए कम से कम न्यायपालिका को तो महंगाई का अहसास हुआ

शनिवार, अगस्त 15

सूख जाएगी गंगा

भारत की मोक्षदायिनी गंगा नदी सूखने की कगार पर है। वैज्ञानिकों के भविष्यवाणी को अगर सही माने तो जीवन दायिनी गंगा अब कुछ ही वर्षों की मेहमान है। और जब ऐसी स्थिति आएगी तो हमें अपने पाप धोने के लिए गंगा का पानी नसीब नहीं होगा। क्या गंगा मैया इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगी...ये जानने के लिए पहले गंगा नदी के उदगम के बारे में जानना होगा

हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकल कर करीब 200 किलोमीटर का सफर तय करके गंगा नदी गोमुख होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। इससे पहले गंगा नदी में 6 नदियों का विलय होता है...अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा से मिलती है...उसके बाद थोड़ा आगे चलकर नंदप्रयाग में नंदाकिनी नदी का विलय होता है...कर्णप्रयाग में पिंडर नदी मिलती है...रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी से मिलन होता है... आखिर में देव प्रयाग में भागिरथी से मिलकर गंगा नदी अपने वास्तविक रूप में आती है और शिवालिक पहाड़ी से होती हुई हरिद्वार में अवतरित होती है।

इसके बाद ये नदी क़रीब 2,510 किलोमीटर का लंबा सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस दौरान ये मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरती है। इसमें से हरिद्वार, इलाहाबाद और वाराणसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं से काफी जुड़े हुए हैं। ये गंगा नदी भारत की लगभग आधी आबादी के लिए जीवन दायिनी बनी हुई है। कहीं इसके पानी का इस्तेमाल पीने के लिए हो रहा है तो कहीं इससे निकाली गई नहरों से सिंचाई की जा रही है। और अगर धार्मिक मान्यताओं की बात करें तो हिन्दुओं ने इसे माता का दर्जा दिया है और वे इसकी पूजा करते हैं। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थों में भी इस नदी का जिक्र मिलता है।

अब वही गंगा मैया इतिहास के पन्नों में सिमटने की तैयारी कर रही है और इसकी वजह है हमलोगों के पाप जो ग्लोबल वार्मिंग बनकर पल पल इसे आखिरी मुकाम की ओर ढ़केल रहे हैं। जी हां वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग को ही गंगा नदी के सूखने की वजह बताई है। उनके मुताबिक गंगा नदी जिस गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है वो तेजी से पिघल रहा है। गंगा नदी का क़रीब 70 फीसदी पानी इस ग्लेशियर से आता है और ये हर साल 50 यार्ड की रफ़्तार से पिघल रहा है। जो कि दस साल पहले किए गए अनु्मान से दोगुना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार इस तरह से जारी रही तो 2030 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएगा और सूखने लगेगी गंगा नदी। वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक उस स्थिति में गंगा नदी मौसमी नदी बनकर रह जाएगी...जो केवल बरसात के मौसम में ही नज़र आएगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो जरा सोचिए उस पूरी आबादी का क्या होगा जो इस जीवन दायिनी और मोक्ष दायिनी के सहारे जी रहे हैं साथ ही उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जिनकी आस्था इस नदी से जुड़ी हुई है....इसलिए यही सही वक्त है कि हम सचेत हो जाएं और गंगा नदी को बचाने का संकल्प लें...

आज़ादी के मायने


एयर कंडीशन्ड दफ़्तरों और घरों में बैठकर आजादी का मतलब निकालना काफी आसान होता है...लेकिन आजाद फिज़ा और आजाद वातावरण में आजादी की बात करना आजकल थोड़ा मुश्किल हो गया है..अगर आप घर से बाहर निकल कर आजादी की सांस लेना चाहते हैं तो आप ऐसा नहीं कर सकते क्यों कि खुली हवा में फैक्ट्रियों और गाड़ियो ने ज़हर घोल दी है...क्यों कि विकास की आंधी और शासन-प्रशासन ने उन्हे प्रदूषण फैलाने की आजादी दे दी है...

आजकल लड़कियां जब अपने फैशन की आजादी के साथ घर से बाहर कदम रखती है तो उसे हर तरफ से आजाद ख़्यालात से रूबरू होना पड़ता है क्यों कि खुद को मर्द समझने वाले मनचले अपने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ उन्हे हर नुक्कड़ पर खड़े मिल जाते हैं..क्यों कि इन मनचलों को हमारे समाज और पुलिस ने ऐसा करने की आजादी दे रखी है...यही हाल दूसरे अपराधियों का भी है जो घर में घुसकर और राह चलते लोगों को लूट रहे हैं क्यों कि उन्होने भी पुलिस महकमे को अपनी आजादी की फीस दे रखी है...और तो और आज की तारीख में शासन के कमजोर हाथ के नीचे पुलिस भी आजादी से गुंडागर्दी कर रही है..

अगर आप समझते हैं कि आप आजाद देश के आजाद नागरिक हैं तो ये गलतफ़हमी सरकारी दफ़्तरों में बैठे बाबू लोग दूर कर देंगे..क्यों कि आपको वहीं जाकर पता लगेगा कि आपको अपनी आजादी पाने के लिए कितना शुल्क अदा करना पड़ेगा..आखिर हो भी क्यों नहीं बाबू लोग तो रिश्वत लेने की आजादी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं..अगर उन्हे रोकने की कोशिश की गई तो शायद वो लोग मानवाधिकार आयोग का दरवाजा भी खटखटा दें...

नेताओं की बात करें तो वो तो खुद को आजादी के ठेकेदार ही समझते हैं..उन्हे तो हर बात की आजादी है वो चाहें तो घोटाला करें, वो चाहें तो संसद में सवाल उठाने के लिए पैसे लें, वो चाहें तो सरकार को बचाने के लिए सांसदों की ख़रीद-फरोख़्त करें, वो चाहें तो गुंडागर्दी करें, वो चाहें तो किसी की हत्या कर दें...लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता..क्यों कि शायद उन्हे ऐसा करने की आजादी मिली हुई है...ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं ऐसे आजादी के परवाने हमारे समाज में ना जाने कितने मौजूद हैं..

इतना सब कुछ होने के बावजूद हम आज आज़ाद हैं क्यों कि हमारे अंदर आज़ादी का जज़्बा है..और हमारे ख़्यालात आजाद हैं...बस जरूरत है समाज में मौजूद तथाकथित आज़ादी के दिवानों के पर कतरने की...तभी हमारा मुल्क वाकई आज़ाद होगा...जय हिन्द

शुक्रवार, अगस्त 14

भगवान कृष्ण भगाएंगे स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू ने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया है..इसका प्रकोप कहीं कम है तो कहीं ज़्यादा..फिर भी लोगों को उम्मीद है कि इस बार भी उनके किशन कन्हैया गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्हे इस संकट से उबार लेंगे...अगर लोगों को ये उम्मीद नहीं होती तो शायद देश भर में दही-हांडी के मौके पर इतनी भीड़ नहीं उमड़ती...मुंबई और पुणे जैसे सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में भी हर तरफ दही-हांडी की धूम दिखी..इस धूम में फ़िल्मी सितारों ने भी जमकर अपनी भागीदारी दिखाई.. ये अलग बात है कि स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामले को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार इस आयोजन पर पाबंदी लगाने की फिराक में थी..अब सवाल ये उठता है कि क्या वाकई भगवान कृष्ण अपने भक्तों की रक्षा करेंगे या फिर जन्माष्टमी के मौके पर हुए इन आयोजनों से स्वाइन फ्लू के फैलने की रफ्तार और भी तेज हो जाएगी..खैर अगर मामला धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ हो तो शासन और प्रशासन दोनों ही लाचार नज़र आते हैं..शायद ऐसा ही कुछ हुआ दही-हांडी के आयोजनों में भी...पूरे दिन गोविंदाओं की टोलियां कंधे से कंधा मिलाकर दही की हांडी फोड़ते रहे और शासन-प्रशासन मूक दर्शक की तरह देखता रहा...अगर इस आयोजन के बाद भी स्वाइन फ्लू का ज़्यादा फैलाव नहीं होता है तो मेरी आस्था भगवान में और बढ़ जाएगी...हो सकता है कि आप में से कई लोगों को मेरी ये दलील रास ना आए लेकिन आंख मूंदकर सामने से आ रहे खतरे को टाला तो नहीं जा सकता...ये तो बात थी भगवान के प्रति आस्था की..

अब रुख करते हैं आंध्रप्रदेश की जहां के मुख्यमंत्री डॉक्टर राजशेखर रेड्डी की आस्था झंडू बाम में है...क्यों कि आजकल वो स्वाइन फ्लू को ख़त्म करने के लिए झंडू बाम लगाने की वकालत कर रहे हैं...उनका नारा है "झंडू बाम लगाओ स्वाइन फ्लू दूर भगाओ"..अब ये तो शोध का विषय कि झंडू बाम में ऐसा क्या है जिससे स्वाइन फ्लू को काबू में किया जा सकता है..लेकिन ये बात तो तय है कि अगर आंध्रप्रदेश की जनता ने अपने मुख्यमंत्री की बात मानी तो इस मंदी के माहौल में भी झंडू बाम बनाने वाली कंपनी को जबरदस्त मुनाफा होगा...ये भी हो सकता है झंडू बाम वाले राजशेखर रेड्डी को अपना ब्रांड अंबेस्डर ही बना दें..
चलिए अब आपको मध्यप्रदेश ले कर चलते हैं जहां पर स्वाइन फ्लू की जांच के लिए संदिग्ध मरीजों के सैंपल को दिल्ली और पुणे भेजा जाता है..अब यहां सोचने वाली बात ये है कि स्वाइन फ्लू से प्रभावित दिल्ली और पुणे में पहले ही मरीजों की लंबी कतारें लगी हुई है तो ऐसे में उसे मध्यप्रदेश से आए सैंपल की जांच में तो वक्त लगेगा ही..और ऐसा ही हो भी रहा है..मध्यप्रदेश में सैंपल की जांच रिपोर्ट आने में कम से कम आठ से दस दिन लग रहे हैं...अब इस बात से आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं मध्यप्रदेश स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए कितना तैयार है..और अगर वहां पर स्वाइन फ्लू नहीं फैल रहा है तो शायद ये भी महाकाल की कृपा ही है

गुरुवार, अगस्त 13

घर की मुर्गी दाल बराबर

एक बहुत प्रचलित कहावत है "घर की मुर्गी दाल बराबर" इस कहावत का मतलब भले ही कुछ और निकलता हो लेकिन आजकल ये कहावत शाब्दिक तौर पर सच साबित हो गया है...आजकल जिस तेजी से दाल की कीमत में बढ़ोत्तरी हो रही है उससे तो अब मुर्गी और दाल दोनों के भाव में कोई अंतर नहीं रह गया है..हां कहावत को थोड़ा व्यापक बनाया जा सकता है..कहावत में घर और बाहर दोनों ही जगह की मुर्गियों को शामिल किया जा सकता है...क्यों कि आजकल कहीं की भी मुर्गी की कीमत दाल से ज़्यादा नहीं है...कल इसी मामले में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था..वो भी रोज बढ़ती इस महंगाई से परेशान थे..उनका तर्क था कि अब दाल की जगह घी का इस्तेमाल करना चाहिए...उन्होने अपने तर्क को साबित करने के लिए बताया कि एक किलो घी से पूरा महीना निकाला जा सकता है लेकिन उसके मुकाबले दाल ख़पत ज़्यादा होगी..उन्होने अपने खाने के मीनू में चावल, घी, नमक और रोटी,घी,नमक जैसे व्यंजन जोड़ लिए हैं। उनकी ये तरकीब मुझे भी पसंद आई...इसके आगे मैने सोचा कि अगर चावल घी नमक खाते-खाते बोर हो गया तो फ्लेवर बदलने के लिए एक कटोरी घी में एक चम्मच दाल या सब्जी मिलाई जा सकती है...

पिछले दिनों मैं मिठाई की दुकान पर गया...मैने बहुत ही ललचाई आंखों से समोसे की ओर देखा लेकिन उसके भाव में भी दो रुपए का उछाल आ गया था..अब तो ऐसा लग रहा था जैसे समोसा ही मुझे खाने वाली नज़रों से घूर रहा हो...मिठाई की दुकान से अपनी जीभ समेट कर आगे बढ़ा तो मुझे याद आया कि घर में सब्जी नहीं है...मैं सब्जी वाले के पास पहुंचा और सब्जियों के भाव पूछने लगा...सब्जियों के भाव सुनकर लगा कि अगर मैं एक महीने तक सब्जियां खाना बंद कर दूं तो मेरे एक महीने के पेट्रोल का खर्चा निकल आएगा...फिर भी मन मसोस कर कुछ मोलभाव कर कुछ निम्न श्रेणी की सब्जियां खरीद ली...पहले सब्जियों के साथ धनिया पत्ती फ्री में मिलती थी अब तो धनिया पत्ती खरीदने पर कुछ सब्जियां फ्री में मिल रही हैं... दूध का भाव जिस तरह से चढ़ रहा है उससे तो लगता है जैसे इसकी लत शराब की लत से भी ज़्यादा बुरी हो...बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि शराब की लत में लोग अपना घर-बार भी लुटा देते हैं...पर मुझे लगता है अब दूध पीने के लिए ही लोगों को अपना घर-बार लुटाना पड़ेगा.. उस पर से नेताओं का आश्वासन कि जल्दी ही महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा..अरे इन नेताओं का क्या है ये लोग तो बोफोर्स तोप, चारा, कोयला और ना जाने क्या क्या खाकर अपना पेट भर लेते हैं..लेकिन हम आम लोगों को पेट भरने के लिए दाल-रोटी ही खानी पड़ती है..क्यों कि इससे ज़्यादा हमें हज़म भी तो नहीं होती

बुधवार, अगस्त 12

मंत्री के द्वार पहुंचा स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू ने अब मंत्रियों के घर पर भी दस्तक देना शुरू कर दिया है..जी हां स्वाइन फ्लू ने दिल्ली सरकार में मंत्री हारुन युसुफ के दोनों बेटों को अपनी चपेट में ले लिया है..ये दोनों बच्चे दिल्ली के ही प्रतिष्ठित संस्कृति स्कूल के छात्र हैं..इस नए मामले ने दिल्ली सरकार के दावों की पोल खोल दी है..कल तक पुख्ता इंतजाम का दावा करने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित आज बगलें झांक रही है। दिल्ली में अभी हालात नियंत्रण में है और अभी तक क़रीब तीन सौ मामलों की पुष्टि हुई है लेकिन राजधानी में जिस तरह से इस संक्रामक बीमारी को हल्के में लिया जा रहा है...उससे हालात के जल्दी ही बेकाबू होने के संकेत मिलने लगे हैं...दिल्ली के लोगों को अभी भी इससे बचाव की ज़्यादा जानकारी नहीं है..दिल्ली देश की राजधानी होने के कारण यहां पर प्रभावित इलाकों से आने वाले लोगों की कमी नहीं है..इसलिए बचाव के उपाय किए बिना यहां पर स्वाइन फ्लू पर अंकुश लगा पाना काफी मुश्किल होगा..अगर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की बात की जाए तो यहां पर जिस तरीके से मॉल संस्कृति में तेजी आई है उससे स्वाइन फ्लू को तेजी से बढ़ने में काफी मदद मिलेगी...अभी तक राज्य सरकार ने एहतियात के तौर संवेदनशील जगहों को चिन्हित नहीं किया है...दिल्ली का मौसम भी इस बीमारी को फैलाने में काफी मददगार साबित हो सकता है क्यों कि आजकल जिस तरह से वातावरण में नमी बरकरार रह रही है उससे स्वाइन फ्लू के वायरस को फैलने में काफी सहूलियत मिलेगी...दिल्ली सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अगले साल उसे कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करनी है...और इसकी तैयारी में दिल्ली सरकार ने करोड़ों रूपए दांव पर लगा दिए हैं..ऐसे में अगर स्वाइन फ्लू से हालात ख़राब हुए तो दिल्ली को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है...और जहां तक इसके इलाज की बात है तो उसके लिए हमारे देश में नवम्बर से पहले कोई ठोस उपाय नहीं किए जा सकते हैं...तो कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि फिलहाल बीमारी से बचाव ही इसका इलाज साबित हो सकता है

चीन की दादागिरी

चीन एक बार फिर भारत को आंखे दिखाने लगा है...उसकी बुरी नीयत का खुलासा उसके थिंक टैंक के विचारों से हुआ है..इस थिंक टैंक के विचारों का चीनी सरकार पहले भी पालन करती रही है..अब इस थिंक टैंक ने भारत को 20-30 टुकड़ों में बांटने की राय दी है..उसका मानना है कि भारत को टुकड़ों में बांटकर ही एशिया में चीन का दबदबा बन सकता है। इसके लिए उसने पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे मित्र राष्ट्रों की सहायता लेने की भी राय दी है...चीन के नापाक मंसूबों के बारे में हम शुरू से ही जानते हैं..यहां हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि उसी के शह पर नेपाल में सत्ता पलट हुआ और वाम दल वहां की सत्ता पर काबिज हो गए..यानि चीन एक लंबे अर्से से पर्दे के पीछे से भारत को तोड़ने की कोशिश करता रहा है..अब सवाल ये उठता है कि चीन के इस रवैये का मुक़ाबला करने के लिए हम कितने तैयार हैं...

अगर सामरिक शक्ति की बात करें तो हम कई मामलों में चीन से काफी पीछे हैं और इस बात को खुद नेवी के चीफ ने भी माना है...फिर भी हमें सतर्क रहने की जरूरत है..लेकिन हमारा विदेश मंत्रालय अब भी चीन से बेहतर रिश्ते की दुहाई दे रहा है..उसका मानना है कि भारत को बांटने की राय चीन के एक निजी संस्था की है और चीन आधिकारिक तौर पर भारत से अच्छे रिश्ते चाहता है..इस मौके पर मैं विदेश मंत्रालय को 1962 का वाक्या याद दिलाना चाहूंगा जब पंडित नेहरू भी चीन को "पंचशील का सिद्धांत" की दुहाई देते रह गए और उसने भारत पर हमला कर दिया..हमारा देश आज एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है और हम फिर वही गलती दोहराने की भूल कर रहे हैं...हाल ही में भारत ने जिस तरह से पाकिस्तान के चतुर प्रधानमंत्री के सामने जिस तरह से घुटने टेके उससे तो यही जाहिर होता है कि हमारा विदेश मंत्रालय कूटनीतिक मामले में दिवालिया हो गया है...

अगर विदेश मामलों की बात करें तो कुछ दिन पहले इसी विदेश मंत्रालय ने ढ़िढ़ोरा पीटा था कि पाकिस्तान मुंबई हमले में मारे गए चार आतंकवादियों को अपना नागरिक मान रहा है और वो भारत से उनके शव लेना चाहता है...लेकिन विदेश मंत्रालय जिसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहा था उसकी हवा पाकिस्तान ने एक झटके में निकाल दी..वो इस बात से बिलकुल मुकर गया कि उसने मुंबई हमले में मारे गए आतंकवादियों को अपना नागरिक माना था...कहने को तो विदेश मंत्रालय में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार शशि थरूर जैसे नेता बैठे हुए हैं लेकिन क्या उनकी जानकारियों और कूटनीतिक समझ का फायदा भारत को मिल रहा है?...आखिर में घूम फिरकर बात वहीं आ जाती है कि हम गलती पर गलती किए जा रहे हैं फिर भी उन ग़लतियों से सबक लेने की समझ हमारे अंदर नहीं आई..और जब तक ऐसा होता रहेगा हमारे पड़ोसी मुल्क ऐसे ही हमें आंख दिखाते रहेंगे...

सोमवार, अगस्त 10

आज़ादी की घटती कीमत

15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस..ये वो दिन है जिसके लिए आजादी के दीवानों ने बड़ी कीमत अदा की..उन्होने आजादी का सौदा अपनी जान से किया..उन्होने तिरंगे का मान रखने के लिए सीने पर ना जाने कितनी गोलियां खाई..शायद उन्होने सोचा होगा कि आने वाली पीढ़ी आजादी की इस कीमत को याद रखेंगे...पर ऐसा कुछ नहीं हुआ...कल हमारी सोसायटी में एक लड़का हाथों में छोटे-छोटे झंडे लेकर बेचने आया था..उसे बड़ी आशा थी कि सोसायटी में रहने वाले और लंबी गाड़ी में घूमने वाले लोग उसके सारे झंडे ख़रीद लेंगे...उसने अपने झंडे की कीमत रखी थी एक रुपया...इस एक रुपए में उसे बीस पच्चीस पैसे का मुनाफा होना था...वो हाथों में ढ़ेर सारे झंडे लेकर सोसायटी में घूम रहा था..इसी बीच मुंह में पांच रुपए का सिगरेट दबाए एक शख़्स उसके पास पहुंचा और उसने पांच झंडे लेकर तीन रुपए लड़के की तरफ बढ़ा दिया...लेकिन लड़के ने उसे झंडा देने से मना कर दिया..लड़के का ये रवैया उस शख़्स को रास नहीं आया और उसने उसे दो चार भद्दी गालियां देते हुए सोसायटी से बाहर निकाल दिया...इस जनाब के रवैये से मुझे अहसास हुआ कि हमारे तिरंगे की कीमत भी अब गिरने लगी है...उस अनपढ़ गंवार लड़के की नज़रों में झंडे की कीमत भले ही एक रुपए थी लेकिन ऊंची सोसायटी में रहने वाले पढ़े-लिखे लोगों को तिरंगे के इस कीमत पर भी ऐतराज था...

ऐसा नहीं है कि ये कुछ लोगों की मानसिकता है...मुझे याद आ रहे हैं कॉलेज के वो दिन जब मैं दिल्ली युनिवर्सिटी के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहा था...उन दिनों मैने और मेरे कुछ दोस्तों ने कॉलेज में स्वतंत्रता दिवस को धूमधाम से मनाने का निश्चय किया...हमलोगों ने अपना पॉकेट मनी मिलाया और फिर कॉलेज के दूसरे साथियों से भी चंदा करने के लिए निकल पड़े..हमें उम्मीद थी कि हमारी मेहनत रंग लाएगी...लेकिन सुबह में बनी हमारी ये उम्मीद शाम तक टूटने लगी थी..हालात ऐसे बन गए थे कि कॉलेज के लड़के-लड़कियां हमें देखते ही कन्नी काटने लगे थे...और जो अन्जाने में कन्नी नहीं काट पाते थे वो बमुश्किल अपने पॉकेट से दो-तीन रुपए निकालकर हमारे हाथ पर रख देते थे..ख़ैर किसी तरह से हमने सारी व्यवस्थाएं की और सादे तरीके से स्वतंत्रता दिवस मनाया..इस वाकये को गुजरे कुछ ही दिन हुए थे कि कॉलेज के कुछ लड़कों ने कॉलेज में रेन डांस का आयोजन किया...हमें आश्चर्य तो तब हुआ जब कॉलेज के हमारे साथियों ने इसके लिए बिना कहे पचास-पचास, सौ-सौ के नोट आयोजकों के हवाले कर दिए...उस पल भी मुझे आज़ादी की गिरती कीमत का अंदाजा हुआ....

पिछले साल मैं अपनी गाड़ी की सर्विसिंग करान के लिए एक प्रतिष्ठित सर्विस सेंटर पर गया था...वहां पर मैने देखा कि कई छोटे-छोटे तिरंगे गाड़ियों के आस-पास फेंके हुए थे..जब मैं उन्हे उठाने लगा तो वहां बैठे सर्विस सेंटर के एक कर्मचारी ने कहा..साहब आप बेकार में ही परेशान हो रहे हैं..थोड़ी देर में कचरा वाला आएगा और ये सब उठा कर ले जाएगा..वैसे भी 26 जनवरी को नए झंडे खरीदे जाएंगे..ये पुराने वाले झंडे तो बेकार हो गए हैं। उस पल भी मुझे अहसास हुआ कि अपनी आजादी कितनी सस्ती हो गई है

स्वाइन फ्लू का ख़ौफ़

स्वाइन फ्लू जितनी तेजी से पूरे देश को अपने चंगुल में लेता जा रहा है उससे आने वाले दिनों में हालात के और भयावह होने की आशंका जताई जा रही है...इससे मरने वाले लोगों की संख्या पांच हो गई है...इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित पुणे है..यहां पर लोगों ने डर कर अपने घरों से निकलना बंद कर दिया है..लेकिन पुणे में इस बीमारी की जांच करने के लिए केवल एक ही लैब है यानि प्रभावितों को जबतक स्वाइन फ्लू से ग्रसित होने का पता चलेगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी...कुल मिलाकर कहें तो इस बीमारी से निपटने के हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं है...अब अगर अमेरिका और यूरोपियन देशों से इस मामले में सफाई मांगी जाए तो मेरे ख्याल से ये ग़लत नहीं होगा..क्यों कि यही वो देश हैं जो भारत में प्लेग फैलने पर हायतौबा मचा रहे थे और हमारे देश को उन्होने अछूत का तमगा दे डाला था..लेकिन अब जबकि उन्ही देशों ने हमे इस स्वाइन फ्लू का दंश दिया है तो हम उनके ख़िलाफ़ बोलने तक की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं..शायद हमारे कमजोर इच्छा शक्ति वाले राजनीतिज्ञों को उनके सामने दुम हिलाने की आदत सी हो गई है तभी तो उनका हर जुल्म हंसते-हंसते शह लेते हैं..आखिर सहें भी क्यों नहीं ये वही राजनेता हैं जो अमेरिका की एक ही घुड़की पर करगिल की बाजी हाथ में आते हुए भी पाकिस्तानी सैनिकों को सुरक्षित वापस चले जाने देते हैं...ये वही राजनेता है जो मिश्र में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ साझा बयान जारी कर अपने देश की इज्ज़त का सौदा कर देते हैं...अगर इन सबों को एक नज़र से देखा जाए तो स्वाइन फ्लू से ज़्यादा ख़तरनाक ये नेता ही नज़र आएंगे

शनिवार, अगस्त 8

भजन गाओ..जेल जाओ

बड़े पुराने कहते हैं कि भजन गाने से भक्तों पर भगवान की कृपा होती है..शायद यही सोचकर मुंबई के लोकल ट्रेन में कुछ भक्तगण भजन गाने में मशगूल थे..लेकिन इस बार भगवान की जगह उनपर आरपीएफ के जवानों की कृपा हो गई..और उन्होने भजन मंडली को जेल भेजने की तैयारी कर ली..पर शायद भगवान अपने भक्तों को ज़्यादा परेशान होता नहीं देख सकते थे इसलिए उन्होने उन्हे जेल जाने से बचा लिया..लेकिन भक्तों को जुर्माने के तौर पर दो-दो सौ रुपए देने पड़े और कोर्ट में पेश होने की फ़जीहत भी झेलनी पड़ी...इनलोगों पर आरोप था कि ये लोग जोर-जोर से भजन गा कर अपने सहयात्रियों को परेशान करते थे और अपने साथियों के लिए अवैध तरीके से सीटों पर क़ब्जा भी जमा लेते थे...ये प्रकरण तो एक उदाहरण मात्र है..ऐसी भजन मंडलियां मुंबई और दिल्ली समेत लगभग सभी बड़े शहरों के लोकल ट्रेन में दिख जाती हैं जो टाइम पास और दादागिरी के लिए भजन गाते हुए सफ़र करते हैं...ऐसी ही कुछ मंडलियां और तथाकथित संतों की टोलियां मुहल्लों में भी लाउड स्पीकर लगाकर भजन करते हुए दिख जाते हैं..ये अलग बात है कि इन लोगों को इन्ही मुहल्लों में रहने वाले कुछ धर्मभीरू लोग पैसे देकर बुलाते हैं...लेकिन ये लोग अपनी धार्मिक आस्था दिखाने के चक्कर में भूल जाते हैं कि उनके इस शोरगुल से मुहल्ले में रह रहे कई दूसरे लोग काफी परेशान होते हैं..पर इन्हे क्या, इन्हे तो बस भजन के माध्यम से मोटी कमाई करने से मतलब है...ये अलग बात है कि शायद इनकी कानफोडू मतलबी भजन से भगवान भी अपने कानों में रूई डाल लेते होंगे

सोमवार, जुलाई 27

ये कैसी जीत ?

कुछ दिन पहले मेरे पड़ोसी शर्मा जी के यहां पिछले दरवाजे से दो तीन लोग घुस आए..उन दिनों शर्मा जी अपने किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे..लेकिन उन्होने लापरवाही दिखाते हुए पिछला दरवाजा खुला ही छोड़ दिया था...उनकी लापरवाही की वजह थी सोसायटी में पुख़्ता सुरक्षा इंतजाम का होना..उन्हे लगता था कि उनकी सोसायटी में तो राम राज है यहां तो किसी तरह की चोरी डकैती हो ही नहीं सकती...खैर, चार-पांच दिनों के बाद जब वो वापस अपने घर लौटे तो, घर में पहले से छिपे दो तीन बदमाशों ने उनसे मारपीट शुरू कर दी..शर्मा जी ने सिक्योरिटी गार्ड को बुलवा लिया और उनलोगों से भिड़ गए...दो तीन घंटे तक मारपीट चलती रही..इस दौरान शर्मा जी के बेटे को काफी चोटें आई, खुद शर्मा जी का भी चश्मा और उनके आगे के दो दांत टूट गए...आख़िरकार, इस बात की जानकारी मिलते ही पुलिस भी मौके पर पहुंच गई..शर्मा जी ने घर में घुस आए बदमाशों की शिकायत उनसे की लेकिन पुलिस ने बीच बचाव करते हुए शर्मा जी को शांत रहने के लिए कहा और घर में घुस आए लोगों से आईन्दा बदमाशी ना करने की बात कहते हुए वहां से चले जाने को कहा...शाम को शर्मा जी मेरे घर मिठाई का डिब्बा लेकर आए और मुझे अपनी वीरता के किस्से सुनाने लगे...लेकिन मुझे उनकी वीरता हज़म नहीं हो रही थी..मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि शर्मा जी की जीत वाकई जीत थी या फिर वो अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए उसे अपनी वीरता के झूठे किस्से कंबल से ढ़ंक रहे थे...इस पूरे मामले में अगर किसी ने वीरता दिखाई थी तो वो था शर्मा जी का बीस साल का बेटा जो अपनी जान की परवाह ना करते हुए उन बदमाशों से भिड़ गया..हालांकि इस पूरे मामले में उसे काफी चोटें आई लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और बदमाशों के होश ठिकाने लगा दिए...अब मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है कि अगर शर्मा जी ने अपने लापरवाही के कारण घर में घुस आए बदमाशों को, भगा दिया तो क्या ये उनकी जीत है या फिर कुछ और ? खैर इन सब बातों से मुझे क्या लेना..मुझे तो बस आज शाम उनके घर जाना है उनकी जीत की पार्टी में शामिल होने के लिए...लेकिन शर्मा जी की ये पूरी कहानी मुझे दस साल पहले हुए करगिल युद्ध की याद दिला गई ...जिसमें हमारे 524 जांबाज शहीद हो गए थे..मुझे वो शहीद शर्मा जी के बेटे जैसे लगे...मैं उन जांबाज शहीदों को सलाम करता हूं लेकिन क्या अपनी जमीन को दुश्मनों के हाथ से छिनने के दिन को विजय दिवस कहना चाहिए ?

शनिवार, जुलाई 25

कैसे ख़त्म हो कैंसर ?

कहते हैं कि कैंसर एक लाइलाज बीमारी है..आज से पहले तक शायद ये सही भी था लेकिन अमेरिका में बसे एक भारतीय डॉक्टर ने ये साबित कर दिया कि कैंसर का भी इलाज हो सकता है..मुंबई में जन्मे डॉ विवेक रांगनेकर ने इंसानों के शरीर में पार-4 नाम का एक ऐसा प्रोटीन ढूंढ निकाला है जो शरीर में पल रहे कैंसर के विषाणुओं को ख़त्म कर देता है...यानि ये वही बात हो गई कि हिरण जिस कस्तूरी को ढूंढ़ने के लिए मारा-मारा फिरता है वो उसकी नाभी में ही मौजूद होता है..डॉक्टर साहब की ये खोज वाकई सराहनीय है...लेकिन मैं तो एक ऐसे डॉक्टर की तलाश में हूं जो समाज के कैंसर को ख़त्म करने की कोई तरकीब बता दे...कहीं सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते बुजुर्ग अपने पेंशन की ख़ातिर बाबुओं के रिश्वत रूपी कैंसर से पीड़ित हैं तो कहीं राह चलती लड़कियां मनचलों की फब्तियों के कैंसर से पीड़ित है...नेताओं के बारे में तो क्या कहने उन्होने तो भ्रष्टाचार के कैंसर को इस कदर पूरे देश में फैला दिया है कि..जिसे देखो वही इससे पीड़ित नज़र आता है...ये नेता अपने स्वार्थ के लिए कभी दंगों का ब्लड कैंसर फैलाते हैं तो कभी आम जनता की आवाज़ दबाने के लिए गले का कैंसर...ऐसा नहीं है कि इन कैंसरों को रोकने की कोशिश नहीं की जाती...नेता लोग ही खुद इसे रोकने के लिए आगे आते हैं लेकिन उन्हे चाहिए प्रोटीन एम..समझ गए ना..जी हां ढ़ेर सारे पैसे। अगर ज़ेहन पर जरा जोर डालिए तो शायद आपको याद आ जाए कि वर्षों पहले बोफोर्स तोप की सौदेबाजी में करोड़ों की दलाली का खुलासा हुआ था..उस वक्त इसको लेकर काफी हायतौबा मचाई गई..और इसकी भेंट चढ़ी कांग्रेस की सरकार...लोगों ने सोचा कि नेता लोग इससे सबक लेगें और आईन्दा ऐसी हरकत नहीं करेंगे...लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ..आज ही सीएजी की रिपोर्ट आई..उसमें साफ-साफ लिखा था कि रूस से विमान वाहक युद्धपोत गोर्सकोव और फ्रांस से सबमैरिन की दलाली में हज़ारों करोड़ रुपए के वारे न्यारे किए गए हैं...अगर इन पैसों को नेताओं और बाबूओं की झोली से निकाल कर आम जनता के लिए इस्तेमाल किया जाता तो शायद अपने देश में बेरोजगारों की संख्या में कुछ कमी आ जाती...पर ऐसा कुछ नहीं हुआ क्यों कि कैंसर तो लाइलाज बीमारी है... इसे रोकने के लिए भी हमें अपने समाज के अंदर के प्रोटीन को निकालना होगा...ये प्रोटीन हमारी और आपकी जागरुकता और ग़लत इरादो को ज़मींदोज करने की हमारी इच्छा शक्ति हो सकती है